सामाजिक बदलाव के अगुआ
स्पैन जनवरी/फ़रवरी 2010
अमेरिका का लोक उपकार संगठन इंडीकॉर भारतीय अमेरिकियों को विभिन्न क्षेत्रों में वॉलंटियर कार्य करने और अपनी जड़ों से जुड़ने में मदद करता है।
कार्तिक रमन नहीं चाहते थे कि वह सिर्फ बैठे रहें और यह शिकायत करते रहें कि दुनिया में क्या गलत हो रहा है। वह बाहर निकलकर इस बारे में कुछ करना चाहते थे। रमन कहते हैं, ‘‘बजाय इसके कि अमेरिका में बैठकर यह जानें कि भारत में समस्याएं हैं, मैं यहां आना चाहता था और बदलाव लाने की मेरी सीमा को परखना चाहता था।’’ वह न्यू जर्सी में जन्मे और ओहायो में पले-बढ़े। उनका परिवार तमिलनाडु से है। ‘‘मैं भारत की ज़मीनी सचाइयों के बारे में भी नहीं जानता था, विशेषकर ग्रामीण भारत। एक आदिवासी गांव में जाने पर मुझे लगा कि मैं अपनी संस्कृति विशेषकर तमिल संस्कृति के बारे में जान सकता हूं।’’
रमन को इंडीकॉर के साथ काम करके अपने इस सिद्धांत को जांचने का अवसर मिल गया कि ‘‘सामाजिक बदलाव के लिए काम करके हम यह चयन करते हैं कि हम किस तरह की दुनिया में रहना चाहते हैं।’’ टेक्सस से संचालित इस गैरलाभकारी संगठन का गुजरात में भी कार्यालय है और यह पूरी दुनिया में भारतीय मूल के लोगों को भारत में किसी गैरसरकारी संगठन के साथ एक साल के लिए काम करने में मदद करती है। रमन कहते हैं, ‘‘मुझे विशेषकर इंडीकॉर का विकासात्मक तरीका अच्छा लगा क्योंकि इसमें स्थानीय समुदायों के साथ काम कर टिकाऊ बदलाव लाने की बात है।’’
वह जनवरी 2007 में भारत आए और उन्हें तमिलनाडु के वेल्लोर जिले की नैकानेरी पहाड़ियों में काम करने का जिम्मा मिला। रमन का प्रोजेक्ट लघु, पहाड़ों पर रहने वाले आदिवासी समुदाय के लिए पोषाहार गोष्ठी का था। वह कहते हैं, ‘‘लेकिन जैसा भारत में अक्सर होता है, चीज़ें उस तरह से नहीं हुई जैसे सोची गई थीं और मैंने ज़्यादातर समय एक कुम्हार के साथ पॉट इन पॉट डिजाइन और वितरित करते बिताया।’’
पॉट इन पॉट यानी पीआईपी ग्रामीण रेफ्रिजरेटर हैं जिन्हें क्ले के एक पात्र को दूसरे पात्र के अंदर रखकर तैयार किया जाता है। बीच के हिस्से में रेत और पानी भरा जाता है रमन कहते हैं, ‘‘इस उपकरण के साथ ... गांव के लोग अपनी फल और सब्जियों को ज़्यादा समय तक सुरक्षित रख पाए। इससे उनके स्वास्थ्य में सुधार के साथ ही उनका पोषाहार भी बेहतर हुआ। इससे भी बेहतर बात यह है कि पीआईपी लोगों की पहुंच में थे और इसके लिए गांव वालों ने खुद तकनीक के लिए भुगतान किया और उन्हें सब्सिडी की ज़रूरत नहीं पड़ी।’’
उनकी फ़ेलोशिप जनवरी 2008 में खत्म हो गई लेकिन रमन बागड़, राजस्थान में ग्रामीण महिलाओं के बिजनेस प्रोसेस आउटसॉर्सिंग उपक्रम सॉर्स फ़ॉर चेंज के साथ काम करने को रुक गए। वह कहते हैं, ‘‘खुद के लाभ की सोचे बगैर नेतृत्व प्रदान करना जीवन की ऐसी सीख है जिसे अक्सर गलत तरीकेसे लिया जाता है। इंडीकॉर परियोजना के दौरान मैंने इसे कुछ इसी तरह से परिभाषित किया कि वॉलंटियर बनने की वह इच्छा जिसमें गरीब से गरीब लोगों की सेवा की बात हो। मैंने यह जाना है कि इसका अर्थ उतना ही साफ है जितना किसी उद्देश्य के लिए काम करना, खुद के निजी लाभ के लिए नहीं।’’ उनके अनुसार, ‘‘इंडीकॉर के साथ काम करने के बाद भारत में बीता मेरा जीवन इसी बात को पूरी तरह से समझने से रूबरू रहा है लेकिन शुरुआत इंडीकॉर से मिली सीख से ही हुई।’’
वर्ष 2008 के फ़ेलो अमृत धीर महसूस करते हैं कि इंडीकॉर ‘‘एक आश्चर्यजनक संगठन है, सिर्फ इसलिए नहीं कि फ़ेलो जिस गैरसरकारी संगठन से संबद्ध होते हैं, उसके लिए योगदान करते हैं (ऐसा तो वे करते ही हैं।) बल्कि अपने निजी विकास के लिए भी और उस अनुभव के लिए जो हर फ़ेलो को हासिल होता है।’’ धीर कहते हैं, ‘‘यह अनुभव किसी भी तरह जीवन में तब्दीली से कम नहीं होता।’’ धीर कैलिफ़ोर्निया से हैं और बेंगलूर में काम कर रहे हैं। अपनी फ़ेलोशिप के दौरान उन्होंने मंज़िल संगठन के साथ काम किया जो निम्न आय वर्ग वाले युवाओं के लिए नई दिल्ली में लर्निंग सेंटर के रूप में कार्यरत है।
इंडीकॉर की शुरुआत वर्ष 2001 में सोनल शाह और उनके बच्चों रूपल और आनंद ने की। रूपल शाह अब राष्ट्रपति बराक ओबामा के सोशल इनोवेशन ऑफ़िस की प्रमुख हैं। फ़ेलो का चुनाव दो भागों में आवेदन के जरिये होता है और कुछ निबंधात्मक सवाल, फोन पर बातचीत और एक पूर्व इंडीकॉर फ़ेलो के साथ सीधी मुलाकात होती है। उनके पास किसी विश्वविद्यालय की डिग्री या दुनिया में कहीं का भी पांच साल का कामकाजी अनुभव होना चाहिए।
फ़ेलोशिप की अवधि अहमदाबाद, गुजरात में एक शुरुआती शिविर से होती है जो एक महीने तक चलता है और यह बहुत गहन होता है। इसमें ज़मीनी विकास विशेषज्ञ भागीदारों को प्रायोगिक पाठ पढ़ाते हैं। ये लोग सामूहिक चर्चा और सामुदायिक गतिविधियों में भाग लेते हैं। इंडीकॉर में फ़ेलोशिप सहायता पर काम करने वाले एडम फ़ग्यूर्सन कहते हैं, ‘‘इंडीकॉर इस आइडिया पर ज़ोर देता है कि सेवा कार्य कोई लेनदेन नहीं है। हमें बेहतर दुनिया के लिए व्यक्तिगत परिवर्तन के साथ सामाजिक परिवर्तन और अपनी गाथा को सामुदायिक गाथा बनाने का प्रयास करना होता है।’’
पिछले सात सालों में सौ से भी ज़्यादा फ़ेलो ने भारत में एक साल बिताया है। अगस्त 2009 में इंडीकॉर ने 12 समुदाय आधारित भागीदार संगठनों में दो से चार फ़ेलो भेजे। हालांकि ये अलग-अलग पृष्ठभाूमियों से आते हैं जैसे कि चिकित्सा, जन स्वास्थ्य, मार्केटिंग, वित्त और गैर-लाभ प्रबंधन। फ़ेलो में समान चीज़ यह होती है कि वे सभी कुछ बदलाव लाना चाहते हैं। बागड़, राजस्थान में ग्रासरूट्स डवलपमेंट लेबोरेटरी नामक गैरसरकारी संगठन के साथ जुड़े विवेक प्रसाद कहते हैं, ‘‘मैं यहां ‘‘मदद’’ करने नहीं आया हूं- मैं यहां उचित संबंध बनाने और ग्रामीण भारतवासियों के साथ हाथ मिलाकर ग्रामीण गरीबी के हल तलाशने के लिए काम करने आया हूं... वॉलंटियर बनकर मैं अपनी ही भूख को शांत कर रहा हूं।’’
न्यू जर्सी में जन्मे और पले-बढ़े प्रसाद ने कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी, पेन्सिलवैनिया से ग्रेजुएशन किया जहां उन्होंने एक विद्यार्थी संगठन की स्थापना की जो सेवा कार्य और सामाजिक मामलों के लिए प्रतिबद्ध था। वह कहते हैं, ‘‘भारत की कोई चीज़ मुझे बुला रही थी। मैं अपनी जड़ों से जुड़ना चाहता था और भारत के साथ अपने आध्यात्मिक रिश्ते को गहरे तक तलाशना चाहता हूं। मेरा विकास कार्यों और सामाजिक सेवा से पहले से बेहद लगाव रहा है, इसलिए यह स्वाभाविक था कि मैं भारत आकर इस क्षेत्र में काम करूं। मैं ईमानदारी के साथ कहूं तो मैं इस अनुभव को किसी और चीज़ के मुकाबले बदलना नहीं चाहूंगा।’’
प्रसाद नवोदित सामाजिक उपक्रम बागड़ रोज़गार संस्थान यानी बीईआई के लिए काम कर रहे हैं जिसकी स्थापना इंडीकॉर फ़ेलो आशीश गुप्ता ने दो साल पहले की। प्रसाद कहते हैं, ‘‘बीईआई का लक्ष्य ग्रामीण भारत में बेरोज़गारी और न्यून-रोज़गारी को दूर करना है...।’’ वह इंडीकॉर के फ़ेलो साहिल चौधरी समेत दो अन्य वालंटियर के साथ काम कर रहे हैं।
ये लोग ऐसे प्रशिक्षण पाठ्यक्रम आयोजित करते हैं जिनका लक्ष्य ग्रामीण युवाओं द्वारा औपचारिक शिक्षा के जरिये हासिल किए कौशल और आधुनिक भारतीय बाज़ार में ज़रूरी कौशल के बीच की खाई को पाटा जा सके। प्रसाद कहते हैं, ‘‘इसके लिए हम अंग्रेजी बोलचाल, बेसिक कंप्यूटर ज्ञान और लेखा सॉफ़्टवेयर के पाठ्यक्रम चलाते हैं। हम आत्मविश्वास बढ़ाने और पब्लिक स्पीकिंग, प्रस्तुतिकरण कौशल, कामकाज के स्थान पर ध्यान देने की बातें, नौकरी खोजने का कौशल, इंटरव्यू कौशल आदि पर ज़ोर देते हैं।’’
चौधरी और प्रसाद बागड़ में हर रात अपनी प्रस्तुतियां देते हैं। वहां वे ग्रामीणों को नौकरी के बाज़ार के बारे में शिक्षित करते हैं और संस्थान के लिए छात्र भर्ती करते हैं। प्रसाद के अनुसार, ‘‘हमारा ज़्यादा प्रभाव औपचारिक संपर्क के जरिये नहीं बल्कि छात्रों के साथ हमारे व्यक्तिगत रिश्तों के जरिये आता है। इससे समुदाय में लोगों के सोचने के तरीके पर बड़ा असर पड़ता है।’’ अमेरिका लौटकर वह विधि संस्थान में प्रवेश लेना चाहते हैं। लेकिन उनका आखिरी लक्ष्य भारत लौटकर विकास क्षेत्र में काम करना है।’’
हिमाबिंदु रेड्डी को सामाजिक बदलाव के लिए काम करने की प्रेरणा अपने माता-पिता से मिली। वह कहती हैं, ‘‘मैंने अपने माता-पिता को कड़ी मेहनत करते और अपने बच्चों को आरामदायक जीवन के लिए जूझते देखा है... मेरा वालंटियर बनना और सामाजिक कार्य को अपनी बेहतर स्थिति का इस्तेमाल कर दूसरे लोगों को कुछ लाभ देना इसी कड़ी में है।’’
रेड्डी पुणे, महाराष्ट्र में कार्यरत एक गैरसरकारी संगठन चैतन्य से संबद्ध हैं। यह संस्था ग्रामीण महिलाओं को वित्तीय और सामाजिक रूप से शक्तिमान बनाने के लिए राज्य में सेल्फ़ हेल्प ग्रुप आंदोलन को बढ़ावा दे रही है। रेड्डी कहती हैं, ‘‘इस इलाके में स्वास्थ्य के मसले, विशेषकर महिलाओं के स्वास्थ्य के मसले बड़ी चिंता का मसला है। कम खर्च वाली जन सुविधाओं की अक्सर गुणवत्ता खराब होती है और निजी सुविधाएं बहुत खर्चीली हो सकती हैं। इसलिए चिकित्सा के आकस्मिक खर्च किसी भी परिवार को गरीबी में धकेल सकते हैं।’’ वह आंध्र प्रदेश में जन्मीं और उसके तुरंत बाद अमेरिका चली गईं।
वह कहती हैं, ‘‘यही कारण है कि हम महिलाओं के लिए कम कीमत वाली समुदाय आधारित स्वास्थ्य बीमा योजना तैयार कर रहे हैं। आइडिया यह है कि प्रोग्राम को समुदाय द्वारा ही संचालित किया जाए, उसी तरह से जैसे मौजूदा समय में सेल्फ़ हेल्प ग्रुप के तहत माइक्रोक्रेडिट सुविधा संचालित की जाती है।’’ अपनी फ़ेलोशिप के खत्म होने के बाद रेड्डी न्यू यॉर्क सिटी स्थित कोलंबिया विश्वविद्यालय में जन स्वास्थ्य की मास्टर्स डिग्री के लिए पढ़ाई शुरू करेंगी।
हालांकि उनकी फ़ेलोशिप अभी शुरुआती चरण में ही है, रेड्डी कहती हैं कि उन्होंने पहले ही बहुत कुछ हासिल कर लिया है। वह कहती हैं, ‘‘सबसे बड़ी बात मैं यह सोचती हूं कि मैं भारत को अपने पुरखों के घर के रूप में या गर्मियों के अवकाश में यदाकदा जाने वाले स्थल के रूप में ही नहीं देख रही हूं, बल्कि वास्तविक और सच्चे घर के रूप में। कुछ तरह से यह प्रत्यक्ष है- मैं देश के अंदर की परिवहन सुविधाओं, भाषा और सांस्कृतिक परंपराओं से अच्छी तरह परिचित हूं। लेकिन यह अप्रत्यक्ष तौर पर भी है, जुड़े होने का आम अहसास, यह जानना कि यहीं मेरी जड़ें हैं, सिर्फ मेरे माता-पिता की जड़ें नहीं, बल्कि वे जड़ें जो मैंने खुद सींची हैं।’’
लुइजियाना, टेक्सस और वाशिंगटन, डी.सी. में रह चुके राहुल ब्रह्मभट्ट भारत में वालंटियर कार्य कर रहे हैं क्योंकि वे सीधे लोगों के साथ काम करना चाहते थे। वह कहते हैं, ‘‘कारपोरेट दुनिया में कई सालों तक काम करने और मेरे काम का कोई परिणाम न निकलता देख मैंने तय किया कि मैं सामुदायिक कार्य और सामाजिक उद्यमिता के क्षेत्र में काम करना चाहता हूं।’’
ब्रह्मभट्ट गुजरात में अहमदाबाद अल्टीमेट के साथ काम कर रहे हैं जो इंडीकॉर की खेल के क्षेत्र में पहल है और जो अल्टीमेट फ्रिस्बी नामक उच्च ऊर्जा वाले टीम स्पोर्ट्स पर केंद्रित है और इसमें फ़ुटबाल और बास्केटबॉल जैसें कई खेलों के तत्वों का मिश्रण है।
आस्टिन में यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सस में केमिकल इंजीनियरी की पढ़ाई के बाद ब्रह्मभट्ट ने आठ साल तक तेल, गैस और आईटी कन्सलटिंग जैसे तकनीकी क्षेत्रों में काम किया। वह अपने काम के सिलसिले में चीन गए जहां उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्पोर्ट्स के विकास में दिलचस्पी ली। वर्ष 2009 में ब्रह्मभट्ट ने वर्जीनिया की जॉर्ज मैसन यूनिवर्सिटी से स्पोर्ट्स मैनेजमेंट में डिग्री ली। उन्होंने इस बात पर शोध किया कि भारत में बॉस्केटबाल को लोकप्रिय कैसे बनाया जा सकता है।
वह कहते हैं, ‘‘हम ऐसी खेल संस्कृति को प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रहे हैं जिसके दायरे में पूरा शहर हो, जिस तक सभी की पहुंच हो और जिसमें स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और वैयक्तिक चुनौतियों की सच्ची ताकत हो... इस यात्रा पर हमें कई लोगों की चुनौतियों से रूबरू होना पड़ा है जिनका कहना है कि गेम्स से ज़्यादा आवश्यक और बहुत सी ज़रूरतें हैं।’’
युवा खिलाड़ियों, टीमों और कोच विकसित करने के अलावा ब्रह्मभट्ट यह संदेश प्रसारित करना चाहते हैं कि ‘‘खेल ऐसा नया जरिया हो सकते हैं जिससे लोग जीवन के बड़े कौशल जैसे टकराव का समाधान, भोजन और पोषाहार, स्वास्थ्य, साफ-सफाई, खेल भावना, टीम वर्क, ईमानदारी पर काम कर सकते हैं और इनका विकास कर सकते हैं।’’
सभी फ़ेलो मानते हैं कि भारत में काम करना चुनौतीपूर्ण है लेकिन इसके अपने फायदे हैं। प्रसाद कहते हैं, ‘‘यहां सफल होने के लिए जिस शैली में काम करने की ज़रूरत होती है, वह अमेरिका से बिल्कुल अलग है। मैं कहूंगा कि चीज़ें कभी भी बनाई योजना के अनुसार नहीं होती और आपको आश्चर्य के लिए तैयार रहना होता है। उनके अनुसार, ‘‘लेकिन साथ ही ग्रामीण भारत में काम करने के अपने लाभ हैं। बिल्कुल कामकाजी संबंध की चीज़ दुर्लभ है। लोग आशा से ज़्यादा विनम्र, मेहमाननवाज, गर्मजोशी दिखाने वाले और उदार हैं।’’
ब्रह्मभट्ट कहते हैं कि भारत में काम करने के लिए बहुत धैर्य और रचनात्मकता की ज़रूरत पड़ती है। ‘‘लेकिन यह आपको अपनी यात्रा के मार्ग और इर्दगिर्द के माहौल को समझने और सिर्फ अपने गंतव्य तक संकुचित न रहने, में मदद करती है। इसके साथ ही भारत में अपने लक्ष्य हासिल करना ज़्यादा खुशी प्रदान करता है।’’
रेड्डी के लिए चुनौती थी अलग कार्य संस्कृति से तालमेल बिठाने की और बिजली, इंटरनेट जैसी सुविधाओं के बगैर काम करने की। उन्हें ‘‘इंस्टैंट मैसेज और ई-मेल के बजाय चाय पर बातचीत करने’’ की आदत पड़ चुकी है जो उनके लिए बहुत अच्छे पुरस्कार की तरह रहा है। वह कहती हैं, ‘‘मुझे लोगो की ज़िंदगी में झांकने, उनकी गाथा सुनने का अवसर मिला है। लोगों के खुलेपन और अपनी बातें मेरे साथ बांटने से मैं चकित हूं।’’
रेड्डी का सर्वाधिक सफल क्षण वह था जब अहमदाबाद के शुरुआती शिविर में उन्होंने कचरा बीनने वाले एक व्यक्ति के साथ जमीन को खंगालते और कचरे से प्लास्टिक और कांच बीनने में आठ घंटे बिताए। इस सामान को अलग-अलग कर उन्होंने रिसाइक्लिंग गोदाम में भेज दिया जहां से उन्हें दिनभर का मेहनताना मिला- 80 रुपये। रेड्डी कहती हैं, ‘‘भारत का वह पक्ष देखना जो मेरी नज़रों से दूर था, वाकई में मेरे लिए एक सीख था और यह भारत में मेरे काम करने और इसकेप्रति मेरे नज़रिए को आकार देगा।’’
कभी-कभी यादगार क्षण कामकाज के बजाय ऐसी घटनाओं से आते हैं जिनकी हम उम्मीद नहीं करते। प्रसाद याद करते हैं कि किस तरह एनजीओ के कर्मचारी और गांव वालों ने मिलकर सितंबर में दशहरा मनाया। आयोजकों ने आतिशबाजी का कार्यक्रम बनाया था लेकिन बीच में कुछ गड़बड़ी के चलते रावण में अचानक ही विस्फोट हो गया। वह कहते हैं, ‘‘सुंदर आतिशबाजी का मजा किरकिरा हो चुका था। लोग अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे। एक ब़ूढ़ा व्यक्ति मंच से निराशा भरी आवाज में लोगों को शांति बनाए रखने के लिए कह रहा था।’’
‘‘मैं साहिल की ओर मुड़ा और हम खुद को हंसने से नहीं रोक पाए। बागड़ में जीवन का यह अनोखा दृश्य था। बड़ी योजनाओं, चीज़ों का योजना के मुताबिक नहीं होना, अस्त-व्यस्तता और सुंदरता- एक ही क्षण में सभी कुछ।’’





