रॉकवेल, लूकस और स्पीलबर्ग का अंदाज़ है कुछ खास

माइक एंडरसन
जनवरी/फ़रवरी 2011

जॉर्ज लूकस और स्टीवन स्पीलबर्ग के निजी संग्रहों से उधार ली गईं नॉरमन रॉकवेल की पेंटिंग की एक प्रदर्शनी यह बात सामने लाती है कि किस तरह से इस कलाकार ने सुपरस्टार फ़िल्मकारों को प्रेरणा दी।

प्रसिद्धि और व्यावसायिक कामयाबी के अलावा मशहूर फिल्म निर्माता जॉर्ज लूकस और स्टीवन स्पीलबर्ग में ऐसा और क्या है, जो उन्हें अजीज अमेरिकी चित्रकार स्व. नॉरमन रॉकवेल के साथ जोड़ता है?

लगभग 40 देशों के करीब छह लाख लोगों ने पिछले दिनों महसूस किया कि इस सवाल का जवाब है- ‘‘बहुत कुछ।’’ और इस बहुत कुछ में कल्पनाशक्ति, देशभक्ति, हाजिरजवाबी, अतीत के प्रति ललक, उद्यमिता और सबसे खास-कहानी कहने के लाजवाब अंदाज को साथ रखना पड़ेगा। ये तीनों कलाकार कहानी प्रस्तुत करने के मामले में बेजोड़ हैं। रॉकवेल ने पारंपरिक तैलरंगों और चित्रकारी के जरिये अपनी ओर खींचा और प्रेरित किया, तो लूकस और स्पीलबर्ग अपनी जबर्दस्त कामयाब और पुरस्कृत फिल्मों के जरिये आज की पीढ़ी का रॉकवेल जैसा ही मनोरंजन कर रहे हैं।

छह महीने से भी अधिक समय के बाद हाल ही में वाशिंगटन डी.सी. स्थित स्मिथसॉनियन अमेरिकन आर्ट म्यूजियम में एक अलग तरह के भव्य आयोजन को देखने के लिए तरह-तरह के बुजुर्गों और विद्यार्थियों का समूह एकत्रित हुआ। और वह जबर्दस्त आयोजन था- ‘‘टेलिंग स्टोरीज : नॉरमन रॉकवेल फ्रॉम द कलेक्शन्स ऑफ जॉर्ज लूकस एंड स्टीवन स्पीलबर्ग।’’ अमेरिकी जीवनशैली और फिल्मों से संबंधित रॉकवेल की लाजवाब तस्वीरों के अंतर्संबंधों को परखने की यह पहली इतनी बड़ी प्रदर्शनी थी। जनवरी के शुरुआती दिनों में इसका समापन हुआ।

रॉकवेल का भारत से रिश्ता

Norman Rockwell, about 1950. Norman Rockwell Museum, Licensed by Norman Rockwell Licensing, Niles, IL
नॉरमन रॉकवेल 1950 के आसपास के दौरान।
नॉरमन रॉकवेल म्यूज़ियम, नॉरमन रॉकवेल लाइसंसिंग द्वारा लाइसेंस, नाइल्स, आईएल।

नॉरमन रॉकवेल को यात्रा करना बहुत पसंद था और वह अलग-अलग लोगों व संस्कृतियों के बारे में जानने को लेकर काफी उत्सुक रहते थे, लेकिन उनका ज्यादातर काम अपने देश ‘‘एवरीडे अमेरिका’’ की घटनाओं या नामचीन अमेरिकियों के छायाचित्रों पर केंद्रित है। हालांकि उन्होंने दो बार भारत की यात्रा की थी। वर्ष 1962 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का छायाचित्र और तस्वीर बनाने के लिए रॉकवेल नई दिल्ली आए थे। नेहरू का वह छायाचित्र 19 जनवरी 1963 के सैटरडे इवनिंग पोस्ट के मुखपृष्ठ पर छपा था। 12 दिसंबर 1963 को अमेरिकी सूचना सेवा प्रकाशन द अमेरिकन रिपोर्टर के मुताबिक, रॉकवेल ने बताया कि एक महान मानवतावादी के रूप में मैं नेहरू का प्रशंसक हूं। उन्होंने कहा, ‘‘मुझे भारत से बहुत लगाव है, खासकर उसके लोगों और उनकी उन सभी चीजों से, जिसके पक्ष में वे खड़े हैं।’’

भारत से संबंधित रॉकवेल की एक पेंटिंग है ‘‘द पीस कॉर इन इंडिया।’’ इसमें दिखाया गया है कि शांति सेना की एक महिला स्वयंसेवी भारत के पांच जिज्ञासु स्कूली बच्चों को विज्ञान पढ़ा रही है। पैन एम एयरलाइन्स की तरफ से विज्ञापनों की एक शृंखला तैयार करने के सिलसिले में साठ के दशक में रॉकवेल ने कोलकाता का भ्रमण किया था। उस दौरे में वह कोलकाता के अलावा 15 और शहरों में गए थे।
Clipping from American Repoter

स्मिथसॉनियन के आयोजकों के मुताबिक, लूकस और स्पीलबर्ग ने रॉकवेल की कृतियों के अंतर्संबंधों को पहचाना है, जो अत्यंत मर्मस्पर्शी और आनंदित करने वाला, निष्कपट और विनोदपूर्ण है। प्रदर्शनी में रॉकवेल की 57 मूल पेंटिंग्स और चित्रों को शामिल गया था। रॉकवेल की कलाकृतियों की अब तक न जाने कितनी ही सार्वजनिक प्रदर्शनियां लगी होंगी, लेकिन जिस खास बात ने इस आयोजन को अलहदा बनाया, वह है इसमें शामिल वे कलाकृतियां, जो लूकस और स्पीलबर्ग के निजी संकलनों से उधार ली गई थीं और जिन्हें आम अवाम ने पहले कभी नहीं देखा था। इस प्रदर्शनी का एकमात्र केंद्र था- स्मिथसॉनियन अमेरिकन आर्ट म्यूजियम। इस आयोजन ने रॉकवेल के विलक्षण कलाकार के पुनर्मूल्यांकन की पृष्ठभूमि तो तैयार की ही, इसने अमेरिकी मूल्यों, उसके अतीत, वर्तमान और कल्पना शक्ति के संदर्भ में नई बहस की भी शुरुआत कर दी। इसने अमेरिका की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाने और संग्रहालय में आने वाले दर्शकों को एक अनूठा अहसास उपलब्ध कराने की स्मिथसॉनियन की क्षमता को भी रेखांकित किया।

इस प्रदर्शनी के हजारों दर्शकों में भारत में पैदा हुई सुचित्रा मैत्रा भी थीं। सुचित्रा पहले कोलकाता स्थित अमेरिकन सेंटर में कार्यरत थीं, फिलहाल वह वाशिंगटन डी.सी. के उपनगर वर्जीनिया की पब्लिक लाइब्रेरी अर्लिंगटन में लाइब्रेरियन हैं। लाइबे्ररी में रखी रॉकवेल की अनेक जीवनियों और कला संबंधी पुस्तकों में से कुछ को दिखाते हुए सुचित्रा स्पैन को बताती हैं, ‘‘स्मिथसॉनियन में रॉकवेल की प्रदर्शनी को देखना सचमुच काफी आनंददायक रहा। अमेरिकी ज़िंदगी को उकेरती रॉकवेल की कृतियां मर्मस्पर्शी कहानी कहती हैं। मैंने इस चित्रकार के बारे में बहुत कुछ जानकारियां हासिल की हैं। वह एक पेंटर से कहीं बड़े कहानीकार हैं। रॉकवेल का एक-एक चित्र हजार शब्दों से भी अधिक मूल्यवान हैं।’’

लूकस और स्पीलबर्ग खुले दिल से स्वीकार करते हैं कि 1960 के दशक में जब वे बड़े हो रहे थे, तब रॉकवेल का उन पर जबर्दस्त प्रभाव था। रॉकवेल का काम चित्रकारी, पत्रिकाओं के मुखपृष्ठों, ग्रीटिंग कार्ड्स, कैलेंडरों, विज्ञापनों और यहां तक कि एक फिल्म में कैमियो भूमिका तक फैला हुआ था। हालांकि वह न्यू इंग्लैंड में रहते थे, लेकिन उन्हें हॉलीवुड का सफर करना काफी पसंद था और फिल्मी पोस्टरों की डिजाइन तैयार करने के वक्त उन्हें यह मौका मिल ही जाता था। रॉकवेल कहते थे कि यदि वह चित्रकार नहीं बने होते, तो फिल्म निर्देशक बनना पसंद करते।

रॉकवेल की कलाकृतियों और लूकस व स्पीलबर्ग की फिल्मों कई चीजें साझी लगती हैं। ये देश प्रेम, छोटे शहरों के मूल्यों, पल्लवित होते बचपन और जिंदगी की विडंबनाओं को ताजा कर देती हैं। रॉकवेल की कहानी कहने की क्षमता के बारे में लूकस कहते हैं कि उनमें यह योग्यता करीब-करीब एक फिल्म निर्देशक की तरह ही थी। ‘‘स्टार वार्स’’ के निर्माता लूकस बताते हैं, ‘‘रॉकवेल का हरेक चित्र या तो कहानी का मध्य होता है या फिर उसका अंत। आप उसके छूटे हुए तमाम अंशों को देख सकते हैं, क्योंकि उनकी एक-एक तस्वीर वह सब कुछ कह देती है, जो आप जानना चाहते हैं। और निस्संदेह, फिल्म बनाने में यही योग्यता पाने के लिए हम संघर्ष करते हैं। हम ऐसे बिंबों की तलाश में रहते हैं, जो अपने दृश्य में बहुत सारी सूचनाएं संप्रेषित कर सके। नॉरमन रॉकवेल इस मामले में उस्ताद थे। वह एक तस्वीर में पूरी कहानी कह देने में वाकई माहिर थे।’’

संग्रहालय की वरिष्ठ क्यूरेटर और रॉकवेल की प्रदर्शनी की आयोजक वर्जीनिया एम. मैक्लेनबर्ग शिक्षकों की गाइड में विस्तार से लिखती हैं कि रॉकवेल, लूकस और स्पीलबर्ग ने अपनी रचनाशीलता में देशप्रेम, आत्मसम्मान और पारिवारिक मूल्यों को अमर कर दिया है। वह कहती हैं, ‘‘रोजमर्रा के अनुभवों को हास्य और करुणा के साथ इन्होंने कहानी में इस तरह पिरोया कि वे उन अभिलाषाओं के उद्घाटक बन गए, जो अच्छे-बुरे वक्त में अमेरिकियों को शक्ति देती थीं।’’

निस्संदेह, रॉकवेल के कई आलोचक भी थे। अनेक बुद्धिजीवियों और अमूर्तता के कलाकारों ने
रॉकवेल के काम को कथित पारंपरिक मूल्यों का प्रचारक और कलात्मक से अधिक व्यावसायिक बताया। आलोचकों ने रॉकवेल के जन-आकर्षण, उनकी अति-भावुकता, अमेरिकी जीवनशैली की उनकी बारीक दृष्टि और जेल-ओ व केलॉग के उत्पाद से लेकर मैकडोनल्ड के हैम्बर्गर तथा अंडरवुड टाइपराइटर के विज्ञापनों का खूब उपहास उड़ाया।

लेकिन अपने करीबी मित्र लूकस की तरह स्पीलबर्ग रॉकवेल का बचाव करते हैं, ‘‘रॉकवेल के चित्र इस बात के प्रतीक हैं...कि अमेरिका को क्या अजीज है... उन्होंने वास्तव में समाज की अभिलाषाओं व भावनाओं को गहराई में पकड़ा है... रॉकवेल समाज के एक तबके के शिष्ट, परंतु महत्वपूर्ण एजेंडे को, एक तरह की सामाजिक जिम्मेदारी और देशभक्ति को आगे बढ़ाते हैं। वह वाकई अमेरिका में पैदा हुए महानतम लोगों में से एक हैं।’’

1894 में न्यूयॉर्क में पैदा हुए रॉकवेल ने स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी और 22 वर्ष की आयु में यानी 1916 में वह श्रेष्ठ व्यावसायिक कलाकृतियां बनाने लगे थे। 1978 में 84 वर्ष की आयु में मौत तक रॉकवेल अपने काम में जुटे रहे।

ब्वॉय स्काउट के साथ रॉकवेल का लंबा साथ रहा और 50 वर्ष से भी अधिक समय उन्होंने स्काउट कैलेंडर को दिया। लेकिन रॉकवेल की ख्याति द सेटरडे इवनिंग पोस्ट पत्रिका के मुखपृष्ठ के लिए बनाई गई 323 पेंटिंग्स से फैली। टेलीविजन और इंटरनेट के आने से पहले इस पत्रिका के स्वर्णिम दिनों में लाखों लोग इसे पढ़ते थे। रॉकवेल तो उसे अमेरिका का विशाल विंडो-शो कहते थे। इस पत्रिका के साथ वह 50 साल तक जुड़े रहे और फिर इसके बाद एक और लोकप्रिय प्रकाशन ‘लुक’ के साथ 10 वर्षों तक काम किया।

अपने कैरियर के उतरार्द्ध में रॉकवेल ने राजनीति और सामाजिक परिवर्तनों पर कुछ उल्लेखनीय तस्वीरें बनाईं, जिनमें नागरिक अधिकार आंदोलन, राष्ट्रपति कैनेडी का न्यू फ्रंटियर प्रशासन, अमेरिकी अंतरिक्ष कार्यक्रम, गरीबी के खिलाफ युद्ध और शांति सैन्य दस्तों से संबंधित कृतियां शामिल हैं।

उनकी बहुचर्चित कृति ‘‘पोर्टे्रट ऑफ जॉन एफ. कैनेडी’’ ने तो आवरण के रूप में दो-दो बार लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। पहली बार 6 अप्रैल 1963 को, जब कैनेडी राष्ट्रपति थे और दूसरी बार 16 दिसंबर 1963 को, कैनेडी की हत्या के बाद उनकी याद में प्रकाशित अंक के कवर के रूप में। सामाजिक परिदृश्य पर रॉकवेल की सबसे दमदार टिप्पणी ‘‘द प्रॉब्लेम वी ऑल लिव विद’’ के रूप में सामने आई। यह कृति भी उन्होंने 1963 में बनाई। इसमें उन्होंने एक अश्वेत युवती को न्यू ऑर्लिएंस स्कूल में प्रवेश कराने की ऐतिहासिक यात्रा की अगवानी करते चार अमेरिकी मार्शलों को दर्शाया है।

वर्ष 1967 में राष्ट्रपति जेराल्ड फोर्ड ने अमेरिका के सर्वोच्च नागरिक सम्मान द प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम से रॉकवेल को सम्मानित करते हुए कहा कि ‘‘आपने हमारे देश की जीवंत और दिलकश छवियां उकेरी हैं।’’ इसके अगले ही साल मैसाच्यूसेट्स स्थित अपने प्यारे घर में रॉकवेल ने अंतिम सांसें लीं। आज इस जगह पर नॉरमन रॉकवेल संग्रहालय है, जिसमें उनकी विरासत को एक ट्रस्ट सहेजता है।

फिल्म निर्माता रॉकवेल से इस कदर प्रभावित थे कि सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध से उनमें से प्रत्येक ने फिल्म बनाने के लिए रॉकवेल की कृतियां खुद ही उनसे लीं और उनकी फिल्मों ने अमेरिकियों के सार्वभौमिक यथार्थ के कोने-कोने को चित्रित किया। इसने यह भी साबित किया कि एक सामान्य व्यक्ति भी अविश्वसनीय नायक बन सकता है।

मध्य कैलिफोर्निया के छोटे-से शहर मोडेस्टो में पले-बढ़े लूकस कहते हैं, ‘‘रॉकवेल की पेंटिंग्स में जो तमाम चीजें थीं, वे मेरी जिंदगी का हिस्सा थीं। उन्होंने जो कुछ भी उकेरा वह इस बात का दस्तावेज है कि उस वक्त की जिंदगी कैसी थी और ‘अमेरिकन ग्रैफिटी’ में मैंने उसे ही दिखाने की कोशिश की। मैं साठ के दशक की अनूठी साहचर्य परंपरा को दिखाना चाहता था, ताकि दिखा सकूं कि उस वक्त किस तरह से लड़के लड़कियों से नाता जोड़ते थे। वह सब कारों के जरिये होता था और यह सामाजिक संस्कृति का एक खास तरीका था। वह फिल्म सीधे-सीधे रॉकवेल की पैदाइश थी।’’

स्पीलबर्ग ने खुलासा किया है कि वह रॉकवेल की कृति ‘‘फ्रीडम फ्रॉम फीयर’’ से इस कदर प्रभावित थे कि उन्होंने अपनी फिल्म ‘‘एंपायर ऑफ द सन’’ का विचार उसी से उधार लिया है। स्पीलबर्ग प्रोडक्शन ने ‘‘फ्रीडम फ्रॉम फीयर’’ का विस्मरणीय दृश्यांकन किया, जिसमें एक जोड़ा अपने बच्चों को सुरक्षित बिस्तर के नीचे छिपा देता है। रॉकवेल ने वह कृति वर्ष 1941 में राष्ट्रपति फ्रेंकलिन रूजवेल्ट द्वारा कांग्रेस में दिए गए स्टेट ऑफ द यूनियन भाषण ‘‘फोर फ्रीडम्स’’ से प्रभावित होकर बनाई थी। रॉकवेल की फ्रीडम ऑफ स्पीच, फ्रीडम टू वर्शिप, फ्रीडम फ्रॉम वान्ट और फ्रीडम फ्रॉम फीयर द्वितीय विश्व युद्ध के पीड़ादायक दिनों में लोगों में काफी लोकप्रिय हुई थी।

स्मिथसॉनियन में प्रदर्शित रॉकवेल की एक बेहद चर्चित तस्वीर थी- ब्वॉय ऑन हाई ड्राइव। इस कलाकृति में दर्शाया गया है कि गोता लगाने वाले बोर्ड के शीर्ष पर खड़ा एक डरा हुआ बच्चा छलांग लगाने का साहस बटोरने की कोशिश में जुटा है। वर्ष 1946 में बनी यह क्लासिक पेंटिंग आम दिनों में स्पीलबर्ग के ऑफिस में टंगी रहती है। स्पीलबर्ग कहते हैं कि यह तस्वीर मुझे हर रोज एक नई फिल्म बनाने का जोखिम उठाने के लिए प्रेरित करती है।

रॉकवेल के स्वर्णिम दिनों से, बल्कि जब से लूकस और स्पीलबर्ग फिल्में बना रहे हैं और कलाकृतियां इकट्ठा कर रहे हैं, तब से भी अमेरिकी समाज में काफी बदलाव आ चुका है। अब यह देश काफी वैविध्यपूर्ण हो गया है और रंगीन फोटोग्राफी व टेलीविजन के आगमन तथा एंडी वारहोल जैसी पॉप संस्कृति के प्रभावों ने रॉकवेल-शैली की कला की मांग लगभग खत्म कर दी है।

लेकिन स्मिथसॉनियन के ताजा प्रयासों और दुनिया के दो बड़े सृजनशील फिल्म निर्माताओं की उदारता का शुक्रिया कि रॉकवेल की कुछ मूल कलाकृतियां अधिक आसानी से देखने को मिल सकीं। यह बहुत अच्छी बात हुई है। यानी इन कृतियों को देखकर अब और अधिक लोग मुस्कुरा सकेंगे, उनसे शक्ति हासिल कर सकेंगे, मूल्यों के बारे में सोच सकेंगे और शायद हमें सुनाने के लिए नई कहानियों की कल्पना कर सकेंगे।

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माइक एंडरसन सेवानिवृत्त अमेरिकी राजनयिक हैं। वह वाशिंगटन, डी.सी. में रहते हैं।

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The Peace Corps in India by Norman Rockwell.
नॉरमन रॉकवेल की द पीस कॉर इन इंडिया।
नॉरमन रॉकवेल लाइसंसिंग द्वारा लाइसेंस, नाइल्स, आईएल। www.rockwelllicensing.com

Catalogue cover, Norman Rockwell, Movie Starlet and Reporters, 1936.
कैटेलॉग कवर, नॉरमन रॉकवेल, फ़िल्म स्टारलेट एंड रिपोर्टर्स, 1936।
स्टीवन स्पीलबर्ग का संग्रह ©1936 सेप्स: कर्टिस पब्लिशिंग, इंडियानापोलिस, इंडियाना, सर्वाधिकार सुरक्षित।

Norman Rockwell, Boy on High Dive,1947, oil on canvas. Collection of Steven Spielberg.
नॉरमन रॉकवेल, बॉय ऑन हाई डाइव, 1947, कैनवॅस पर ऑयल, स्टीवन स्पीलबर्ग का संग्रह।
©सेप्स: कर्टिस लाइसेंसिंग द्वारा लाइसेंस,, इंडियानापोलिस, इंडियाना, सर्वाधिकार सुरक्षित। फोटो ©2010 अमेरिकन इलेस्ट्रेटर्स गैलरी, न्यू यॉर्क

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जॉर्ज लूकस के संग्रह से


जॉर्ज लूकस, स्टीवन स्पीलबर्ग
फोटोग्राफ: साभार स्मिथसॉनियन अमेरिकन आर्ट म्यूज़ियम।

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