मिलकर कदम बढ़ाते भारत और अमेरिका
यही कामना है कि हमारे दोनों देशों के बीच मित्रता आने वाले सालों में बढ़ती रहे। दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र के प्रतिनिधि के तौर पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को संबोधित करना सच्चा विशेषाधिकार और सम्मान है।
राष्ट्रपति बराक ओबामा,
8 नवंबर, पार्लियामेंट गोल्डन बुक, नई दिल्ली
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... भारत केवल उभरता हुआ देश नहीं है, भारत उभर चुका है। और मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि अमेरिका और भारत का रिश्ता—जो हमारे साझे हितों और हमारे साझे मूल्यों की डोर से बंधा है—21वीं शताब्दी को परिभाषित करने वाली साझेदारियों में से एक होगा। ...
हमारे साझे भविष्य में मेरे विश्वास की जड़ें, भारत के बहुमूल्य अतीत के प्रति मेरे आदर में जमी हुई हैं—एक ऐसी सभ्यता जो हज़ारों वर्षों से विश्व को आकार देती आई है...
निश्चय ही, भारत ने केवल हमारे दिमागों को ही नहीं खोला, उसने हमारी नैतिक कल्पनाओं का भी विस्तार किया—ऐसे धार्मिक पाठों के जरिये जो आज भी आस्थावानों को मान-मर्यादा और संयम का जीवन जीने के लिये पुकारते हैं, ऐसे कवियों के जरिये जिन्होंने ऐसे भविष्य की कल्पना की जहां मन में कोई डर न हो, और सिर ऊंचा उठा रहे। और एक ऐसे व्यक्ति के ज़रिये जिसका प्रेम और न्याय का संदेश आज भी कायम है- आपके राष्ट्रपिता महात्मा गांधी।
मेरे और मिशेल के लिये इस यात्रा का इसलिए एक विशेष अर्थ रहा है। देखिए, मेरे संपूर्ण जीवन में, जिसमें एक युवा के रूप में शहरी गरीबों की लिए मेरा कार्य भी शामिल है, मुझे गांधीजी के जीवन से और उनके इस सीधे-सादे और गहन सबक से प्रेरणा मिलती रही है कि हम विश्व में जो परिवर्तन लाना चाहते हैं, स्वयं वह बनें। और जैसे उन्होंने भारतवासियों को अपना भाग्य स्वयं खोजने के लिए पुकारा, उसी तरह उन्होंने मेरे अपने देश में समानता के ध्वज-वाहकों को प्रभावित किया, जिनमें एक युवा धर्मोपदेशक भी शामिल था जिसका नाम था मार्टिन लूथर किंग। आधी शताब्दी पूर्व भारत की अपनी तीर्थ-यात्रा के बाद, डॉक्टर किंग ने गांधीजी के अहिंसक विरोध को न्याय और प्रगति के संघर्ष में—एकमात्र तर्कसंगत और नैतिक मार्ग—बताया।
इसलिए हमने उस निवास की यात्रा करके स्वयं को सम्मानित महसूस किया जहां गांधी और किंग दोनों ठहरे थे—मणि भवन। और राजघाट पर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करके हमें अपनी साधारणता का अनुभव हुआ। और मैं जानता हूं कि शायद आज मैं, अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में, आपके सामने ख़ड़ा न होता, यदि गांधी जी और उनका वह संदेश न होता, जो उन्होंने बांटा और जिसने अमेरिका और विश्व को प्रेरित किया।
विज्ञान और नवाचार की एक प्राचीन संस्कृति, मानव प्रगति में एक मूलभूत विश्वास—यह है वह मजबूत बुनियाद जिस पर आपने अर्धरात्रि का घंटा बजने के उस क्षण से निरंतर निर्माण किया है जब एक स्वतंत्र और स्वाधीन भारत में तिरंगा लहराया था...
भुखमरी के गर्त में धंसने की बजाय, आपने हरित क्रांति आरंभ की जिसने लाखों का पेट भरा। जिन्सों और निर्यात पर निर्भर बनने की बजाय आपने विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में पूंजी लगाई, उसमें जो आपका सबसे बड़ा संसाधन है—भारत के लोग। और उसका परिणाम दुनिया देख रही है, आपने जो सुपर-कम्प्यूटर बनाए उनसे लेकर भारत के उस झंडे तक जो आपने चांद की सतह पर लगा दिया।
वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रतिरोध करने के बजाय, आप उसका एक इंजन बन गए—लाइसेंस राज में सुधार करके ऐसे आर्थिक चमत्कार को बेड़ी-मुक्त किया जिसने लाखों लोगों को गरीबी से उबारा है और विश्व के सबसे बड़े मध्यम-वर्ग का निर्माण किया है।
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और इस मिथ्या धारणा की ओर आकर्षित होने की बजाय कि प्रगति स्वतंत्रता की कीमत पर ही प्राप्त हो सकती है, आपने उन संस्थाओं का निर्माण किया जिन पर सच्चा लोकतंत्र निर्भर करता है—स्वतंत्र और निष्प्क्ष चुनाव जो नागरिकों को हथियारों का सहारा लिए बगैर अपने नेता आप चुनने का अवसर देता है—एक स्वाधीन न्यायपालिका और क़ानून का शासन, जो लोगों को अपनी शिकायतों का समाधान पाने का मौका देता है; और एक फलता-फूलता स्वतंत्र प्रेस तथा एक जीवंत सभ्य समाज जो यह मौका देता है कि हर आवाज सुनी जाए। इस वर्ष, जब भारत एक सशक्त और लोकतांत्रिक संविधान वाले देश के रूप में 60 वर्ष पूरे कर चुका है, तो यह सबक स्पष्ट है। भारत सफल हुआ है, लोकतंत्र के बावजूद नहीं; भारत सफल हुआ है लोकतंत्र की वजह से।
अब, जैसे भारत परिवर्तित हुआ है, उसी तरह हमारे दोनों देशों के संबंध भी परिवर्तित हुए हैं।
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यहां भारत में अलग-अलग पार्टियों के नेतृत्व वाली, एक-दूसरे के बाद आने वाली दो सरकारों ने यह पहचाना कि अमेरिका के साथ अधिक गहन साझेदारी स्वाभाविक भी है और ज़रूरी भी। और अमेरिका में मेरे दोनों पूर्ववर्तियों ने—जिनमें एक डेमोक्रेट था, और एक रिपब्लिकन—हम दोनों को और निकट लाने के लिए कार्य किया, जिसके परिणाम में व्यापार बढ़ा और एक ऐतिहासिक नागरिक-परमाणु-समझौता संपन्न हुआ।
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अमेरिका सुरक्षा चाहता है—हमारे देश की सुरक्षा, हमारे मित्रों और साझेदारों की सुरक्षा। हम खुशहाली चाहते हैं—एक खुली अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली में एक सशक्त और बढ़ती अर्थव्यवस्था। हम सार्वभौम मूल्यों के प्रति समादर चाहते हैं। और हम एक ऐसी न्यायपूर्ण और जीवनक्षम अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था चाहते हैं जो वैश्विक चुनौतियों का अधिक सशक्त वैश्विक सहयोग के जरिये सामना करके शांति और सुरक्षा को बढ़ावा दे।
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.... हम दो सशक्त लोकतंत्र हैं जिनके संविधान एक जैसे क्रांतिकारी शब्दों से शुरू होते हैं...,‘‘हम इस देश के लोग’’... हम दो महान गणतंत्र हैं जो सभी लोगों के लिये स्वतंत्रता और न्याय और समानता को समर्पित हैं। और हम दो खुले बाज़ार की अर्थव्यवस्थाएं हैं जहां लोग ऐसे विचारों और नवाचारों पर कार्य करने के लिए स्वतंत्र है जो विश्व को बदल सकते हैं। और इसी कारण मेरा विश्वास है कि भारत और अमेरिका हमारे समय की चुनौतियों का सामना करने के लिए अपरिहार्य साझेदार हैं।
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अपने साझेदारों के साथ हमने जी-20 को अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग का एक प्रधान मंच बनाया है, वैश्विक आर्थिक निर्णय लेने में और आवाजों को वार्ता की मेज पर लाए हैं, और इनमें भारत शामिल रहा है। हमने अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका को बढ़ाया है। कोपनहेगन में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका की हमने कद्र की है जहां, पहली बार, सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं ने जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने के लिये क़दम उठाने का वचन लिया—और उन कार्यों के साथ ख़ड़े रहने का प्रण किया। हम संयुक्त राष्ट्र के शांति बनाये रखने के मिशनों में एक प्रमुख योगदानकर्त्ता के रूप में भारत के लंबे इतिहास को सलाम करते हैं। और हम भारत का स्वागत करते हैं जबकि वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपना स्थान ग्रहण करने की तैयारी कर रहा है।
संक्षेप में, जबकि भारत विश्व में अपना न्यायोचित स्थान ग्रहण कर रहा है, हमारे लिए अपने दोनों देशों के बीच संबंधों को आने वाली शताब्दी को परिभाषित करने वाली साझेदारी बनाने का ऐतिहासिक अवसर मौजूद है। और मेरा विश्वास है कि हम तीन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में साथ-साथ काम करके ऐसा कर सकते हैं।
प्रथम, वैश्विक साझेदारों के रूप में हम दोनों देशों में खुशहाली को बढ़ावा दे सकते हैं। मिलकर, हम भविष्य की उच्च-प्रौद्योगिकी, उच्च-वेतन वाली नौकरियां निर्मित कर सकते हैं। अपनी इस यात्रा के साथ, अब हम अपने नागरिक परमाणु समझौते को अमल में लाना शुरू करने के लिए तैयार हैं। इससे भारत की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद मिलेगी और हमारे दोनों देशों में हज़ारों रोज़गार पैदा होंगे।
हमें रक्षा और नागरिक अंतरिक्ष क्षेत्रों जैसे उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में साझेदारियां निर्मित करनी चाहिएं। इसलिये हमें भारतीय संगठनों का नाम अपनी तथाकथित एंटिटी सूची से हटा दिया है। और हम निर्यात पर से अपने नियंत्रणों को हटाने—और सुधारने के लिए कार्य करेंगे। इन दोनों कदमों से यह सुनिश्चित होगा कि अमेरिका से उच्च प्रौद्योगिकी व्यापार तथा प्रौद्योगिकियां चाहने वाली भारतीय कंपनियों के साथ वैसा ही व्यवहार किया जायेगा जैसा हमारे निकटतम मित्रों और साझेदारों के साथ किया जाता है।
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और मिलकर, हम संरक्षणवाद का प्रतिरोध कर सकते हैं जो विकास और नवाचार का दम घोंटता है। अमेरिका विश्व की सबसे ज़्यादा खुली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है—और वैसा ही बना रहेगा। और बाज़ारों को खोल कर तथा विदेशी पूंजी निवेश की राह की बाधाओं को कम करके, भारत भी अपनी पूर्ण आर्थिक संभावनाओं को प्राप्त कर सकता है। जी-20 के साझेदारों के रूप में, हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि वैश्विक आर्थिक पुनरोत्थान सशक्त और टिकाऊ हो। और हम ऐसे दोहा दौर के लिए प्रयास जारी रख सकते हैं जो महत्वाकांक्षी हो और संतुलित हो- ऐसे समझौते करने का साहस दिखा कर जो ऐसे विश्वव्यापी व्यापार के लिए ज़रूरी हैं जो सभी अर्थव्यवस्थाओं के लिए कारगर हो।
मिलकर, हम कृषि को मज़बूत बना सकते हैं। भारतीय और अमेरिकी अनुसंधानकर्ताओं तथा वैज्ञानिकों के बीच सहयोग ने हरित क्रांति की मशाल जलाई थी। आज, भारत ऐसी प्रौद्योगिकी के उपयोग में अग्रणी है जो किसानों को सक्षम बनाती है, जिस तरह के किसानों से मैं कल मिला था जिन्हें मंडी और मौसम के बारे में ताज़ा सूचना अपने सेल फोन पर मु़फ्त प्राप्त होती है। और अमेरिका, कृषि उत्पादकता और अनुसंधान में अग्रणी है। अब जबकि किसानों और ग्राम्य क्षेत्रों को जलवायु परिवर्तन तथा सूखे का सामना है, हम दूसरी, अधिक सतत, सदाबहार हरित क्रांति में प्राण फूंक सकते हैं।
मिलकर, हम अगले मानसून से पहले भारत की मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों में सुधार ला रहे हैं। हमारा लक्ष्य है लाखों भारतीय कृषकों—किसान परिवारों की मदद करना ताकि वे पानी की बचत कर सकें और उत्पादकता बढ़ा सकें, खाद्य पदार्थों के संसाधन में सुधार हो ताकि मंडी जाते हुए मार्ग में फसलें सड़ ना जाएँ, तथा जलवायु और फ़सल पूर्वानुमानों में सुधार हो ताकि नुकसान से बचा जा सके जो समुदायों को अपंग बना देती हैं और खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ा देती हैं।
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क्योंकि किसी देश की संपन्नता उसके लोगों के स्वास्थ्य पर भी निर्भर करती है, हम तपेदिक और एचआईवी/ एड्स जैसे रोगों के खिलाफ भारत के प्रयास को समर्थन देना जारी रखेंगे, और वैश्विक साझेदारों के नाते देशांतरगामी फ्लू के प्रसार को रोकने के प्रयास करके वैश्विक स्वास्थ्य में सुधार के लिए कार्य करेंगे। और क्योंकि ज्ञान 21वीं शताब्दी की मुद्रा है, हम अपने छात्रों, अपने कॉलेजों और अपने विश्वविद्यालयों के बीच आदान-प्रदानों को बढ़ायेंगे, जो कि विश्व के सर्वोत्तमों में गिने जाते हैं।
जबकि हम अपनी साझी खुशहाली के संवर्धन के लिये कार्य करेंगे, हम एक दूसरी प्राथमिकता की दिशा में भी साझेदार बन सकते हैं—और वह है हमारी साझी सुरक्षा। मुंबई में, मैं साहसी परिवारों और उस बर्बर हमले से जीवित बचे लोगों से मिला। और यहां संसद में, जिसे स्वयं निशाना बनाया गया क्योंकि यह लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व करती है, हम उन सबकी स्मृति को श्रद्धांजलि देते हैं जो हमसे छीन लिये गये, जिनमें 26/11 को मारे गये अमेरिकी नागरिक और 9/11 को मारे गये भारतीय नागरिक शामिल हैं।
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और हम पाकिस्तानी के नेताओं से यह आग्रह करना जारी रखेंगे कि उनकी सीमाओं के भीतर आतंकवादियों के सुरक्षित शरण-स्थल स्वीकार्य नहीं हैं, और कि मुम्बई हमलों के पीछे जो आतंकवादी थे उन्हें न्याय के कटघरे में खड़ा किया ही जाना होगा। हमें यह भी समझना होगा कि हम सब का हित एक ऐसे अफगानिस्तान और एक ऐसे पाकिस्तान दोनों में है जो स्थिर, खुशहाल और लोकतांत्रिक हो—और इसमें भारत का भी हित है।
क्षेत्रीय सुरक्षा की खोज में हम भारत और पाकिस्तान के बीच वार्तालाप का स्वागत करना जारी रखेंगे, जबकि हम यह स्वीकार करते हैं कि आपके दोनों देशों के झगड़े आप दोनों देशों की जनता द्वारा ही सुलझाये जा सकते हैं।
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दो वैश्विक नेताओं के रूप में अमेरिका और भारत विश्वव्यापी सुरक्षा के लिए साझेदार बन सकते हैं— विशेषकर अगले दो वर्षों में जबकि भारत सुरक्षा परिषद के सदस्य के रूप में कार्य करेगा। वास्तव में, अमेरिका जो न्यायपूर्ण और जीवनक्षम अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था चाहता है उसमें एक ऐसा संयुक्त राष्ट्र शामिल है जो कार्यकुशल, प्रभावी, विश्वसनीय और वैध हो। यही कारण है कि आज मैं कह सकता हूं, कि आने वाले वर्षों में, मैं उत्सुकता से एक सुधरी हुई संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रतीक्षा कर रहा हूं जिसमें भारत एक स्थायी सदस्य के रूप में शामिल हो।
अब, मैं यह कहना चाहता हूं कि ताक़त बढ़ने के साथ-साथ ज़िम्मेदारी भी बढ़ती है। संयुक्त राष्ट्र का अस्तित्व इसलिये है कि वह अपने स्थापना आदर्शों को पूरा करे जो हैं, शांति और सुरक्षा बनाये रखना, वैश्विक सहयोग को प्रोत्साहन देना, और मानवाधिकारों को बढ़ावा देना। ये सभी देशों के दायित्व हैं, लेकिन विशेष रूप से उनके जो 21 वीं शताब्दी में नेतृत्व करना चाहते हैं। और इसलिए हम भारत के साथ—और उन अन्य देशों के साथ जो सुरक्षा परिषद की सदस्यता की आकांक्षा रखते हैं— यह सुनिश्चित करने के लिये काम करने की बाट जोह रहे हैं कि सुरक्षा परिषद प्रभावी हो, उसके प्रस्तावों पर अमल किया जाए, कि निषेधों का पालन कराया जाए, कि हम उन अंतर्राष्ट्रीय सामान्य नियमों को मज़बूत बनायें जो सभी राष्ट्रों और सभी व्यक्तियों के अधिकारों तथा दायित्वों को मान्यता देते हैं।
इसमें परमाणु हथियारों का प्रसार रोकने का हमारा दायित्व भी शामिल है। जबसे मैंने पदभार संभाला है, अमेरिका ने हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में परमाणु हथियारों की भूमिका को घटा दिया है, और हम अपने हथियारों के भंडारों को घटाने के लिए रूस के साथ सहमत हुए हैं। हमने परमाणु हथियारों के प्रसार और परमाणु आतंकवाद को रोकना, अपनी परमाणु कार्यावली में सबसे ऊपर रखा है, और हमने विश्व-व्यापी अप्रसार प्रणाली की आधारशीला को मज़बूत बनाया है जो है परमाणु अप्रसार संधि।
मिलकर, अमेरिका और भारत विश्व की भेद्य परमाणु सामग्रियों को सुरक्षित करने के अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कार्य कर सकते हैं। हम यह स्पष्ट कर सकते हैं कि हर देश को जहां शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा प्राप्ति का अधिकार है, वहीं हर देश के लिए अपने अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों को पूरा करना भी ज़रूरी है—और इसमें इस्लामी गणराज्य ईरान भी शामिल है। और मिलकर, हम उस स्वप्न को साकार करने के लिए भी काम कर सकते हैं जो भारत के नेताओं की स्वाधीनता-प्राप्ति के समय से ही चाह रहा है- ऐसा विश्व जिसमें परमाणु अस्त्र न हों।
और यह मुझे उस अंतिम क्षेत्र की ओर ले जाता है जहां हमारे दोनों देश साझेदारी कर सकते हैं— लोकतांत्रिक शासन की नीवों को मज़बूत बनाना, देश में ही नहीं विदेश में भी।
अमेरिका में, मेरे प्रशासन ने सरकार को और खुला और पारदर्शी तथा जनता के प्रति और जवाबदेह बनाने के लिए कार्य किया है। यहां भारत में आप भी ऐसा ही करने के लिए प्रौद्योगिकियों का सहारा ले रहे हैं, जैसा कि मैंने कल मुम्बई में एक प्रदर्शनी में देखा। आपका ऐतिहासिक सूचना अधिकार कानून नागरिकों को सक्षम बना रहा है, यह क्षमता देकर कि वे जिन सेवाओं के अधिकारी हैं उन्हें प्राप्त कर सकें—और अधिकारियों को उत्तरदायी ठहरा सकें। मतदाता लिखित बेतार संदेश के ज़रिये उम्मीदवारों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। और आप ग्रामीण समुदायों को शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा पहुंचा रहे हैं, जैसा कि मैंने कल उस समय देखा जब मैं राजस्थान में ग्रामवासियों के साथ ई-पंचायत में जुड़ा।
अब, खुली सरकार के बारे में एक नई सहभागिता में हमारे दोनों देश अपने अनुभव एक-दूसरे के साथ बाटेंगे, यह देखेंगे कि क्या कारगर होता है, और नागरिकों को सक्षम बनाने के अगली पीढ़ी के उपकरण विकसित करेंगे। और भारत-अमेरिकी साझेदारी कैसे वैश्विक चुनौतियों से निपट सकती है, इसके एक और उदाहरण के रूप में, हम इन नवाचारों को सिविल सोसायटी समूहों और विश्व भर के देशों के साथ साझा करेंगे।
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जबकि आप सामने पड़े इस कठिन कार्य को अंजाम देने के लिए प्रयास करें, तो मैं चाहता हूं कि हर भारतवासी यह जान ले कि अमेरिका दर्शक-दीर्घा से जय जयकार करके केवल आपको प्रोत्साहन ही नहीं दे रहा होगा, हम मैदान में आपके साथ ख़ड़े होंगे, कंधे से कंधा मिलाकर क्योंकि भारत जिस आशा का प्रतीक है हमें उसमें विश्वास है। हमें विश्वास है कि भविष्य वही होगा जिसका हम निर्माण करेंगे। हमारा विश्वास है कि चाहे आप कोई भी हों, कहीं से भी आये हों, हर व्यक्ति अपनी ईश्वर-प्रदत्त संभावनाओं को साकार कर सकता है, बिलकुल वैसे ही जैसे एक दलित डॉक्टर आम्बेडकर ने स्वयं को ऊपर उठा कर उस संविधान के शब्द रचे जो सभी भारतवासियों के अधिकारों की हिफाजत करता है।
हमारा विश्वास है कि चाहे आप कहीं भी रहते हों — पंजाब के किसी गांव में या चांदनी चौक की किसी संकरी गली में—कोलकाता के किसी पुराने इलाके में या बैंगलोर की नई ऊंची इमारत में—हर व्यक्ति को सुरक्षा और सम्मान के साथ जीने का, शिक्षा प्राप्त करने का, रोज़गार खोजने का, अपने बच्चों को एक बेहतर भविष्य देने का समान अवसर प्राप्त होना चाहिए।
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यह भारत की कहानी है ; यही अमेरिका की कहानी है— कि अपनी भिन्नताओं के बावजूद, लोग एक दूसरे में स्वयं को देख सकते हैं, साथ-साथ काम कर सकते हैं, और एक गर्वीले राष्ट्र के रूप में साथ-साथ सफलता प्राप्त कर सकते हैं। और यही हमार देशों के बीच साझेदारी की भावना हो सकती है—कि जबकि हम उन इतिहासों का सम्मान करें जिन्होंने भिन्न समय में हमें अलग-अलग रखा, जबकि हम उसे भी संजो कर रखें जो एक वैश्वीकृत संसार में हमें अनूठा बनाता है, हम फिर भी यह पहचान सकते हैं कि एकजुट हो कर हम कितना कुछ हासिल कर सकते हैं।










