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फुल, ब्राइट यादें

हम इस वर्ष अपनी 60वीं वर्षगांठ पर स्पैन के पुराने अंकों से ऐसे विषयों परलेखों को फिर से प्रकाशित कर रहे हैं जो आज भी सामयिक बने हुए हैं। इस अंक में फुलब्राइट प्रोग्राम पर फोकस करते हुए हम एक ऐसे लेख के अंशों को प्रकाशित कर रहे हैं जो मार्च 1988 में प्रकाशित हुआ था।

एम. एस. राजन, फुलब्राइट स्कॉलरों के उस पहले बैच में थे जिन्हें अमेरिकी विश्वविद्यालयों में पढ़ाई के लिए चयनित किया गया था। वह अमेरिकी मेहमाननवाज़ी और शुरुआत में वहां के माहौल में ढलने में आई दिक्कतों के बारे में बता रहे हैं


एक दिन, फॉरेन अ़फेयर्स (न्यू यॉर्क) पत्रिका में मेरी निगाह लॉय हेंडरसन के संस्मरणों से संबंधित एक संक्षिप्त नोटिस पर गई। मेरा दिमाग तुरंत 1950 के दशक के उन शुरुआती वर्षों पर गया जब वह भारत में अमेरिकी राजदूत हुआ करते थे। बतौर फुलब्राइट स्कॉलर अमेरिका की मेरी पहली यात्रा का श्रेय बहुत कुछ उन्हीं की देन रही।

मैं उन दिनों नई दिल्ली की इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स (आईसीडब्लूए) में काम किया करता था। एक दिन आईसीडब्लूए के महासचिव ए अप्पादोराई ने मुझसे अमेरिका में अध्ययन के लिए मिलने वाली एक स्कॉलरशिप का फॉर्म भरने को कहा। मैंने वैसा कर तो दिया लेकिन मुझे उसमें सफल होने की उम्मीद न के बराबर थी क्योंकि मुझे बताया गया था कि उसके लिए अखिल भारतीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा होनी थी। करीब दो महीनों के बाद, मुझे अमेरिकी सूचना सेवा की तरफ से जानकारी दी गई कि मेरा चयन फुलब्राइट स्कॉलर के तौर पर हो गया है और मुझे कोलंबिया यूनिवर्सिटी, न्यू यॉर्क में पढ़़ाई करनी है। स्वाभाविक था कि मैं बेहद उत्साहित था।

दिल्ली से न्यू यॉर्क रवाना होने के पहले, मैंने राजदूत हेंडरसन से अमेरिकी दूतावास में मुलाकात की। वह तब बहावलपुर हाउस, सिकंदरा रोड पर हुआ करता था। स्कॉलरशिप पाने की मेरी खुशी तब दोगुनी हो गई जब उन्होंने मुझे बताया कि मेरा मूल आवेदन अमेरिकी विदेश विभाग (जो उन दिनों आवेदनों के मामले देखता था) ने कहीं खो दिया था और उन्होंने ही इस बात के लिए आग्रह किया था कि चाहे जो भी हो, मुझे वह फेलोशिप दी जानी चाहिए, क्योंकि मैं आईसीडब्लूए के साथ काम करता था। हेंडरसन ने उन लोगों से कह दिया था कि मैं न्यू यॉर्क पहुंचने पर एक नया आवेदन पत्र भर दूंगा। मैं उस समय आज के फुलब्राइट स्कॉलरों के मुकाबले उम्र (30 वर्ष) में बड़ा था लेकिन मैं अमेरिका के बारे में जानकारी को लेकर आज के विद्यार्थियों जितना आत्मविश्वासी नहीं था। न्यू यॉर्क उतरते ही सबसे पहली बात जो सामने आई वह थी मेरी अंग्रेजी। वहां बहुत कम लोग मेरी अंग्रेजी का उच्चारण समझ पाते थे और न ही मैं उनकी अंग्रेजी समझ पाता था। मुझे अपनी बात समझाने के लिए कई बार अपनी बात को धीरे-धीरे दोहराना पड़ता था।

न्यू यॉर्क एयरपोर्ट पर टैक्सी में बैठने से पहले मैंने उस पोर्टर को टिप दी जो मेरा भारीभरकम सूटकेस उठा कर टैक्सी तक लाया था। टिप के पैसों को देख कर पारंपरिक धन्यवाद देने के बजाए वह हंस दिया और फिर उसने अपने सिर और हाथ को टैक्सी के अंदर डालते हुए ड्राइवर से कहा, ‘‘दोस्त, तुम्हे आनंद आएगा।’’ या फिर कुछ उसी से मिलती-जुलती बात कही। मुझे समझ नहीं आया कि वह क्या कह रहा था।

काफी दिनों के बाद जब मैं अमेरिकी पैसों की समझ रखने लगा तो मुझे पोर्टर की उस टिप्पणी का मतलब समझ में आया। मैंने उस वक्त उसे 50 सेंट्स दिए थे। जब डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये (1950 में एक डॉलर पांच रुपए के बराबर था) में मैंने उसकी गणना की तो वह करीब 2.50 रुपये होता था। यह किसी भारतीय पोर्टर को उस समय मैं जो टिप देता, उसका ढाई गुना था और मैं खुद को उदार समझ रहा था। लेकिन वह टिप न्यू यॉर्क के लिहाज से हास्यास्पद हद तक कम थी। लेकिन टिप को ठुकरा कर मुझे नाराज करने के बजाय उसने उस घटना को एक मजाकिया अंदाज में मोड़ दिया। शायद उसे इस बात का अहसास हो चुका था कि मैं विदेशी हूं और यह अमेरिका की मेरी पहली यात्रा थी।

मेरे ठहरने की व्यवस्था वाईएमसीए के स्लोन हाउस में थी। वहां पहुंचने के कुछ ही देर बाद मुझे बेहद प्यास लगी। कमरे और बाहर कहीं भी मुझे कोई नल नहीं दिखाई दिया। फिर मैं रिसेप्शन डेस्क पर गया और मैंने उनसे पूछा कि मुझे कहां पीने के लिए पानी मिल सकेगा। मुझे बताया गया कि, ‘‘हर मंजिल पर एक फाउंटेन लगा है।’’ मैं इस जवाब से और भ्रम में पड़ गया। मैं अपने फ्लोर पर जाकर फाउंटेन को तलाशने लगा लेकिन मुझे कहीं भी ऐसा कुछ नज़र नहीं आया। मैं बेबस हो चला था और यही सोच रहा था कि कैसे अपने सूखे गले को तर कर सकूं तभी मैंने एक नौजवान को दीवार में लगी किसी चीज की तरफ बढ़ते देखा और फिर वहां उसे पानी पीते देखा। तब मुझे समझ आया कि यह अमेरिकी फाउंटेन था।

अगले दिन बस में यूनिवर्सिटी जाते हुए, मैंने अपनी सीट अपने सामने खड़ी एक महिला को ऑफर की। फिर उस महिला ने गुस्से में बहुत कुछ कहा लेकिन वह समझ में नहीं आया। मैं स्तब्ध था और मैंने अपमानित महसूस किया खासकर इसलिए अधिक क्योंकि वहां तमाम यात्री मेरी तरफ घूर रहे थे कि मैंने महिला को नाराज कर दिया था। मैंने अपने बगल के एक यात्री से फुसफुसा कर पूछा कि उस महिला ने क्या कहा। उसने मुस्कराते हुए उसके शब्दों को दोहरा दिया, ‘‘मैं उतनी वृद्ध नहीं हूं।’’ उसके लिए मेरा सीट छोड़ने का प्रस्ताव उसकी उम्र पर सवाल था क्योंकि अमेरिका में लोग सिर्फ वृद्ध महिलाओं के लिए ही सीट छोड़ते हैं।

उम्र के ऐसे ही एक मसले पर एक साल बाद एक परिवार के साथ फिर एक घटना हुई, मैं उस परिवार में सप्ताहांत बिताने के लिए मेहमान बन कर गया। उस वृद्ध अमेरिकी दंपत्ति ने मुझे फिलाडेल्फिया में अपने घर रात के खाने पर बुलाया था। इस मौके पर उन्होंने पास में ही रहने वाली अपनी विवाहित बेटी को भी आमंत्रित किया था। वह नौजवान महिला बडे उत्साह के साथ मुझे (और मेरे एक भारतीय मित्र जो मेरे साथ गए थे) एक हॉकी खिलाड़ी के रूप में पहले के अपने पराक्रम के बारे में बता रही थीं। ऐसे ही बातों-बातों में  एक जगह उसके मुंह से निकल गया कि, मैं अब 38 साल की हो चुकी है... फिर अचानक वह रुक गई। उसके मुंह से सिर्फ ‘‘ओह मम्मी’’ निकला और उसके बाद थोड़े समय तक स्थिति अजीबोगरीब रही। फिर बड़े सलीके से उसकी मां ने बात को घुमाया और बातचीत के सिलसिले को दूसरी तरफ मोड़ दिया। मेरे भारतीय मित्र ने जो एक दिन पहले ही अमेरिका पहुंचे थे, घबरा कर मुझसे पूछा कि क्या मुझसे या उनसे किसी तरह की कोई गलती हुई है। गनीमत थी कि मैं तब तक अमेरिकी रिवाजों को समझने लगा था और अपने मित्र को माजरा समझा पाया कि हकीकत क्या थी। दरअसल, वह महिला अचानक अपनी उम्र की बात मुंह से निकल जाने पर सकपका गई थी। 

डिनर के बाद मेरे मित्र जिन्होंने जिंदगी में पहली बार टीवी देखा था एक प्रोग्राम देखने सिटिंग रूम में चले गए। मैं और मेरी मेजबान रसोई में बर्तनों को साफ करने के लिए चले गए। जब हम सोने की तैयारी कर रहे थे तब मेरे दोस्त में मुझसे बड़़े अचंभे से पूछा, ‘‘तुम रसोई में क्या कर रहे थे?) मैंने बड़ी सहजता से उसे जवाब दिया कि मैं बर्तनों को साफ करने में उनकी मदद कर रहा था।’’ फिर उसका सवाल था कि, ‘‘तुमने ऐसा क्यों किया? मैं तो ऐसा गंदा काम अपने घर में भी नहीं करता’’ उसके बाद मैंने उसे समझाया कि खाने के बाद बर्तनों की सफाई में मेजबान की मदद करना अमेरिकी जीवनशैली का हिस्सा है। लेकिन यह ऐसी चीज़ थी जो उसकी समझ में नहीं आई।

एक रविवार की सुबह अमेरिका में आने के कुछ ही दिनों बाद मैं न्यू यॉर्क टाइम्स अखबार की तलाश में निकला। मैंने एक लड़के को अखबार का एक गट्ठर लेकर आते देखा और उससे एक प्रति मांगी। वह चौंक गया और उसने जवाब में एक जगह की तरफ इशारा करते हुए कहा कि, ‘‘आपको वह वहां मिलेगा।’’ मुझे उस लड़के के व्यवहार पर थोड़ा आश्चर्य हुआ मैं सोचने लगा कि आखिर, मुझसे क्या गलती हो गई। खैर,मैं उसके बाद न्यूजस्टैंड पर गया और वहां अखबार की एक प्रति मांगी। वहां मौजूद शख्स ने एक ऊंचे से ढेर की तरफ इशारा करते हुए कहा कि, ‘‘वह वहां है आप एक ले लें।’’ मैं उस ढेर के करीब गया और यह नहीं समझ पा रहा था कि उसमें से कैसे मैं अखबार को निकालूं। ऐसा लगता था कि वे सभी एकसाथ फोल्ड हो रखे हों। उसके बाद मैं वहां पर कुछ और चीज देखने के बहाने तब तक खड़ा रहा जब तक कि कोई और उस दुकान पर न आ जाए। इस बीच, एक नौजवान वहां आया, उसने काउंटर पर पैसे दिए और उस ढेर में से एक बड़ा सा बंडल उठाया और वहां से तेजी से चला गया। इसके बाद मुझे समझ में आया कि न्यू यॉर्क टाइम्स का रविवार संस्करण कुछ-कुछ एक बड़े से बंडल जैसा ही होता था। आमतौर पर सप्ताह के दिनों के मुकाबले अखबार का रविवार का संस्करण चार गुना बड़ा होता था। सप्ताह के दिनों मे भी वह अखबार भारतीय अखबारों से पांच से छह गुना बड़ा होता था। तब जाकर, मुझे उस लड़के साथ की गई अपनी गलती का अहसास हुआ जिसे मैंने बड़े से अखबार के बंडल के साथ देख कर अखबार बेचने वाला समझ लिया था। 

अमेरिका की मेरी यात्रा का सबसे बेहतरीन समय तब होता था जब मैं वहां लोगों के घर जाता था। मुझे ऐसे लोगों से खाने और सप्ताहांत बिताने का आमंत्रण मिलता था जिनसे मैं ठीक से परिचित भी नहीं था। मैंने 1952 में क्रिसमस का दिन इलिनॉय के दूररदराज के छोटे से शहर शैंपेन में एकअमेरिकी परिवार के साथ बिताया था। जिस शाम मैं वहां पहुंचा, अचानक बिजली चली गई। मेरे दोस्त की मां ने तुरंत इलेक्ट्रीशियन को बुलवाया। वह मिनटों में हाजिर हो गया। वह पूरे घर में बड़े शाही अंदाज में घूम-घूम कर वायरिंग को जहां-तहां से हिलाकर देखने लगा। एक जगह पर वायरिंग छूने से बिजली आ गई। इलेक्ट्रीशियन मुस्कराया, बिल बुक निकाली, उस पर बिल बनाया और महिला को थमा दिया। उसने उस बिल को देखा और चौंक कर बोली, ‘‘क्या? 10 डॉलर। आपने कुछ भी नहीं किया।’’ उसके इस सवाल पर उस इलेक्ट्रीशियन ने बहुत ही सलीके लेकिन मजबूती से अपनी बात को रखते हुए कहा, ‘‘देखिए, आप उस चीज़ का भुगतान करती हैं जो मुझे आती है, उस चीज़ का नहीं कि मैं क्या करता हूं।’’ यह घटना अब भी मेरी स्मृतियों में जिंदा है।

जब मैं अंतरराष्ट्रीय संबंध पर मास्टर्स कर रहा था तो मुझे अपनी कक्षा में कुछ नौजवान तो कुछ अधेड़ उम्र के विद्यार्थी दिखते थे। मुझे आश्चर्य तब हुआ जब मुझे पता चला कि उनमें से कुछ बतौर पेंटर, संगीतकार, न्यूक्लियर-फिजिसिस्ट और कपड़े बेचने का काम भी करते हैं। जिज्ञासावश उनमें से कुछ से मैंने पूछा कि वे ऐसे विषय की पढ़ाई क्यों कर रहे हैं जिसका न तो उनके मौजूदा काम से कोई ताल्लुक है न ही पहले कभी रहा है। उनमें से अधिकतर का जवाब था कि वे अपने काम से खुश नहीं हैं और किसी दूसरे लाभप्रद कॅरियर की तलाश में हैं। उनकी इस तरह से अपने कॅरियर में बदलाव की चाह ने मुझे बहुत गहरे तक प्रभावित किया।

मैं इस बात से भी बहुत प्रभावित हुआ कि वहां विद्यार्थी अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए काम करते हैं। दरअसल, हमारी यूनिवर्सिटी के हॉस्टल और कैफेटेरिया विद्यार्थियों की मदद से ही चल रहे थे। बहुत से ऐसे विद्यार्थी थे जो पढ़ाई के साथ वहां पार्ट टाइम काम भी करते थे। (मैं उनके साथ नहीं जुड़ पाया, क्योंकि मुझे फेलोशिप मिल रही थी।) उनमें से कुछ तो देर रात मेरा टाइपिंग का काम, लॉंड्री और यहां तक कि आइसक्रीम, मेवों और फलों की सप्लाई का काम भी करते थे। ये विद्यार्थी जो भी पैसा कमाते थे, वह उनकी शिक्षा पर खर्च होता था और दूसरी तरफ, यूनिवर्सिटी उनकी उपलब्धता के चलते अपने खर्च में कमी कर पाती थी।

एक खास दिक्कत मैंने जो कोलंबिया यूनिवर्सिटी में झेली, वह थी मेरा शाकाहारी होना। वहां पर पहली क्रिसमस के मौके पर मेरा कमरा साफ करने वाली कर्मचारी ने मुझसे पूछा कि मैंने क्रिसमस पर क्या करने की योजना बनाई है। मैंने उसे बताया कि मुझे न्यू यॉर्क से बाहर एक अमेरिकी परिवार से डिनर के लिए न्यौता मिला है। उसने कहा, ‘‘तब तो काफी टर्की और केक खाने को मिलेगा।’’ मैंने उसे बताया कि  मैं टर्की नहीं खा सकता क्योंकि मैं शाकाहारी हूं। उसने पूछा कि ‘‘आप क्या हैं?’’ वह अचंभित हो गई और उसे मेरी बात पर यकीन नहीं हुआ। वह बोली, ‘‘आप मुझसे मजाक कर रहे हैं। आप गोश्त के बिना कैसे रह सकते हैं?’’ वह इतनी अचंभित थी कि उसने कमरा साफ करने वाली दूसरी कर्मचारी को भी बुला लिया और मुझे शाकाहार पर उन्हें भाषण देना पड़ा। मैंने उन्हें बताया कि सैकड़ों सालों से करोड़ों की तादाद में भारतीय शाकाहार पर जिंदा हैं। वे अचंभित थीं। उनमें से एक बोली ‘‘आप इतने सेहतमंद दिखते हो।’’

यहां तक कि यूनिवर्सिटी के डॉक्टर भी मानते थे कि मांस खाने का संबंध स्वस्थ जीवन से है। जब मैं बीमार पड़ा तो डॉक्टरों ने इस बात को बहुत जोर देकर कहा कि इसकी वजह भोजन में पोषण की कमी है। और फिर उनका पूरा जोर इस बात पर था कि मैं अपने भोजन में कम से कम एक या दो अंडे रोज शामिल करूं। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं ऐसा नहीं कर सकता तो उन्होंने निराश होकर हाथ खड़े कर दिए और मुझे कुछ टॉनिक लेने की सलाह दे डाली।

एम. एस. राजन नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में मानद प्रो़फेसर थे। वह इंडियन स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ के डीन भी रहे, जिसे अब जेएनयू के स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ के नाम से जाना जाता है।