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सदाजीवी भविष्य का खाका

वैश्विक सदाजीविता चुनौतियों से निपटने के प्रयासों में डिजिटल तकनीक युवाओं को नया नज़रिया प्रदान कर रही है।

साउथ फ़्लोरिडा  के किशोरों का एक समूह सघन मैन्ग्रोव जंगल के किनारे से दलदल से गुजरता है। एक युवती काले रंग के अपने झोले में आज की गतिविधि के लिए ज़रूरी चीज़ें लेकर चल रही हैः जल की गुणवत्ता के नमूने बटोरने के काम से जुड़े उपकरण। उधर पृथ्वी के दूसरी तरफ फिलीपीन में हाईस्कूल के छात्रों का एक समूह परिवारों का एक सर्वे करता है, जिसमें सामाजिक-आर्थिक हैसियत के नजरिये से सालाना कार्बन फुटप्रिंट की जानकारी जुटाई जाती है। बोलीविया में छात्र अपने एंडीज माउंटेन समुदाय पर सिकुड़ते ग्लेशियर के असर को जानने के साथ ही झील टाइटिकाका के जल स्तर में नाटकीय कमी भी रिकॉर्ड करते हैं।

ये सारे छात्र इंटरनेशनल प्रोग्राम फॉर यूथ के हिस्से हैं, जिसे माय कम्युनिटी, आवर अर्थ (मायकोई) कहा जाता है। भूगोल के चश्मे से छात्र स्थानीय पर्यावरणीय शोध संचालित करते हैं और फिर देश और दुनिया भर के उन लोगों के साथ अपने नतीजों को साझा करते हैं, जो वैश्विक सदाजीविता के समक्ष उपस्थित चुनौतियों के समाधान ढूंढ़ने के लिए काम कर रहे हैं। यह कार्यक्रम 2002 में दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में सदाजीवी विकास पर आयोजित विश्व सम्मलेन की एक पहल के रूप में शुरू हुआ। पहले छात्रों के प्रोजेक्ट की प्रतियोगिता के रूप में शुरू मायकोई ने भूगोल आधारित प्रायोगिक अध्ययन को प्रोत्साहित करने के लिए विस्तार किया है। इसके तहत मिडिल स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय जाने वाली उम्र के छात्रों के लिए अर्थपूर्ण परिणाम आ रहे हैं। कई सारे संगठन आपस में सहयोग स्थापित करके इस कार्यक्रम को सहायता दे रहे हैं। इन संगठनों में एसोसिएशन ऑफ अमेरिकन ज्योग्राफर्स, नासा, अमेरिकी विदेश विभाग और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम शामिल हैं।

पिछले 13 सालों के दौरान 100 से अधिक देशों में युवाओं के नेतृत्व में लगभग 700 प्रोजेक्ट के संचालन के बाद यह कार्यक्रम विश्वव्यापी कनेक्टिविटी के क्षेत्र में नए भविष्य की संभावनाओं के साथ नवीनतम तकनीक को सामने लाने पर फोकस कर रहा है और बदले में पर्यावरणीय सदाजीविता के लिए एक बेहतर भविष्य की संभावना जग रही है। एसोसिएशन ऑफ अमेरिकन ज्योग्राफर्स में संपर्क एवं रणनीतिक पहल की निदेशक पैट्रिसिया सोलिस याद करती हैं, ‘‘जब हमने पहली बार काम शुरू किया था, उस समय छात्र हाथ से मानचित्र बनाते और हमें भेजते थे। आज छात्र, शिक्षक, परामर्शदाता अपने प्रोजेक्ट मायकोई की वेबसाइट पर काफी आसानी से अपलोड कर सकते हैं। अपने शोध के लिए प्रतिभागी नासा की उपग्रह से मिली ताज़ा तस्वीरों, उच्च क्षमता की ओपन-सोर्स विश्लेषण तकनीक, और एक-दूसरे से मिलने और जानकारी साझा करने के लिए स्काइप कॉन्फ्रेंसिग का लाभ उठा सकते हैं।

सोलिस डिजिटल खाई में कमी और सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग को एक ऐसे प्रभावशाली संयोग के रूप देखती हैं, जो अधिक से अधिक संख्या में आज के युवाओं में भौगोलिक साक्षरता ला सकता है। वह बताती हैं, ‘‘दुनिया की आबादी में युवाओं की संख्या लगभग आधी है और 85 प्रतिशत युवा विकासशील देशों में रहते हैं। अगर इन युवाओं की एक अच्छी-खासी संख्या मानचित्र बनाने, जानकारियों को संग्रह करने, मस्तिष्क में इन चीजों की तस्वीर बनाने, जहां कहीं भी कुछ घट रहा है, उससे खुद को जोड़ने और इन जानकारियों से पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान के लिए क्या किया जा सकता है, इसके बारे में सोचने पर ध्यान दें, तो क्या कुछ नहीं हो सकता है?’’

सोलिस का अनुमान है कि अभी तक मायकोई ग्लोबल कनेक्शंस एंड एक्सचेंज प्रोग्राम में लगभग 18,000 छात्रों ने हिस्सा लिया है। इन गर्मियों में ऑनलाइन मैपिंग और भौगोलिक तकनीक के बारे में अधिक जानकारियों को साझा करने के लिए इंटरनेशनल यूथ टेक कैंप का आयोजन किया जाएगा। कैंप के आयोजन का आरंभ फ़्लोरिडा के डीयरिंग एस्टेट में होगा, जहां लंबे समय से मायकोई प्रोजेक्ट का आयोजन होता आ रहा है और यहां दलदली मैंग्रोव संरक्षण क्षेत्र भी है।

फ़्लोरिडा राज्य के स्वामित्व वाले सार्वजनिक पार्क डीयरिंग एस्टेट में 450 एकड़ का प्राकृतिक संरक्षण क्षेत्र हैं। इसमें सात भिन्न मूल रिहायशी क्षेत्रों और रास्ते हैं। उनके प्रख्यात शैक्षिक और संपर्क प्रोग्राम युवाओं और बुजुर्गों को विलुप्तप्राय जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों का साक्षात अनुभव लेने का अनोखा अनुभव उपलब्ध कराते हैं, यहां तक कि वेटलैंड्स बहाली वाले इलाके के दायरे में भी।

सहायक निदेशक जेनिफर तिस्थामर बताती हैं कि पिछले साल मायकोई के साथ डीयरिंग एस्टेट के सहयोग से युवाओं के नेतृत्व में दर्जनों प्रोजेक्ट किए, जो पर्यावरण प्रदूषण, जैव-विविधता, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य और बीमारी तथा शहरीकरण से जुड़े थे। वह बताती हैं, ‘‘हर प्रोजेक्ट

में संरक्षण का नज़रिया था, फ़ील्ड स्टडी का नज़रिया था और भूगोल या नक्शे का नज़रिया था। इससे आप अपनी जगह पर वैश्विक मामलों को समझने और इनका दुनिया के दूसरे हिस्सों से संबंध देखने लगते हैं।’’

डीयरिंग एस्टेट युवाओं में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करने के लिए दीर्घकालीन तरीकों पर अमल करता है। तिस्थामर बताती हैं, ‘‘हम संरक्षण और पर्यावरण से संबंधित निर्णय-प्रक्रिया से जुड़ने का क्या मतलब होता है, इस पर फोकस करते हैं।’’ वह बताती हैं, ‘‘हम ऐसे नागरिकों का निर्माण करना चाहते हैं जिन्हें जानकारी हो और जो स्थानीय संसाधनों, जिनके बारे में वे जानते हैं, के प्रति एक तरह का लगाव विकसित करें। अगर बाद में वे दूसरी जगह चले जाते हैं, तब भी वे अपने साथ स्थानीयता, प्राकृतिक चीजों, जो उनके लिए महत्वपूर्ण थीं, के बारे में अपनी जानकारी और अपनेपन के साथ उस जगह के प्रति लगाव को भी साथ लेकर जाते हैं। उम्मीद की जा सकती है कि ये युवा कल जब बुजुर्ग होंगे, तब तक वे कॉरपोरेट दुनिया में उस उद्योग में महारत हासिल कर चुके होंगे। उन्हें पता होगा कि प्राकृतिक पर्यावरण में ये चीजें उपस्थित हैं। वे उन तरीकों को जानेंगे, जिनके जरिये मानव और प्रकृति समरसता के साथ जी सकते हैं। और इस तरह वे वैश्विक जिम्मेदारी व प्रबंधन का पालन करेंगे।’’

तिस्थामर पर्यावरणीय चुनौतियों के मामले में उन ताजा दृष्टिकोणों और विचारों की तारीफ करती हैं, जिन्हें लेकर युवा आते हैं और जिन चुनौतियों के समाधान के लिए उम्रदराज लोग अक्सर जूझते रहते हैं। वह कहती हैं, ‘‘जब बच्चे चीजों को देखते हैं, तो उनके अंदर इन चीजों को लेकर कोई पूर्वाग्रह नहीं होता। वे सहजता और अंतर्दृष्टि के साथ इन पर विचार करते हैं।’’ इसी से बच्चों को अपने समुदायों और दुनिया भर में स्थिति में सकारात्मक बदलाव लाने में मदद मिलती है। 


जेन वार्नर मल्होत्रा स्वतंत्र लेखिका हैं। वह वाशिंगटन,डी.सी. में रहती हैं। 

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महेंद्र kumar का छायाचित्र

वाकई सदाजीवी!