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खामोश न रहें

महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए सामुदायिक प्रयास महत्वपूर्ण।


जब हम महिलाओं के खिलाफ हिंसा के बारे में सोचते हैं तो हम अक्सर पीडि़तों और हमलावरों के बारे में सोचते हैं। किसी विशेष मामले में ऐसा सोचना सही हो सकता है लेकिन लैंगिक हिंसा से व्यापक स्तर पर मुकाबले के लिए- ऐसी बुराई जो सीमाओं से परे है और सभी संस्कृतियों में मौजूद है- तो हमें पूरे समुदाय पर नज़र डालनी होगी।

महिलाओं को शक्ति, हिंसा की रोकथाम
SLAP conducts self-defense workshops for girls and women of all ages and professions. Photograph courtesy SLAP

भारत और दुनिया भर के अनेक लोगों की तरह ही मृगांका डडवाल को भी 2012 में नई दिल्ली में हुए ‘‘निर्भया’’ बलात्कार मामले से गहरा झटका लगा था। लेकिन दूसरों के विपरीत, उन्होंने एक नई पहल के माध्यम से भारतीय महिलाओं की रक्षा और उन्हें सशक्त बनाने के लिए एक कार्यक्रम शुरू करने का निर्णय लिया- गली-मोहल्ले के स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम या स्ट्रीट लेवल अवेयरनेस प्रोग्राम यानी स्लैप।

डडवाल कहती हैं, ‘‘हम कैंडल मार्च और फेसबुक गतिविधि से परे जाना चाहते थे और महिलाओं के बलात्कार, हमले और सार्वजनिक उत्पीड़न से आहत अपने शहर की छवि को बदलने के लिए कुछ व्यावहारिक करना चाहते थे।’’ वह अमेरिकी विदेश विभाग के इंटरनेशनल विजिटर्स लीडरशिप प्रोग्राम की भागीदार रही हैं। लैंगिक हिंसा की रोकथाम के विषय से जुड़े कार्यक्रम के सिलसिले में वह मार्च 2014 में अमेरिका गई थीं।

 2013 में अपनी स्थापना के बाद से, स्लैप ने नई दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई सरीखे विभिन्न शहरों में - व्यापारिक पेशेवरों से लेकर कॉलेज के छात्रों और गृहिणियों तक के लिए दज़र्नों कार्यशालाएं आयोजित की हैं।

डडवाल स्कूलों, कालेजों और छोटे समुदायों में स्लैप क्लब की स्थापना के जरिए इस कार्यक्रम की पहुंच का विस्तार करने की योजना भी बना रही हैं।

स्लैप के पास स्वयंसेवकों की एक बड़ी तादाद के साथ ही तीन आत्मरक्षा प्रशिक्षक और एक परामर्शदाता हैं। डडवाल कहती हैं कि शुरुआत में, स्लैप ने सौ या अधिक प्रतिभागियों के साथ खुली कार्यशालाओं का आयोजन किया, जिससे लोगों में जागरुकता बढ़ाने में मदद मिली, लेकिन इसमें महिलाओं को होने वाला लाभ सीमित था। इसलिए हमने 25 से 30 की संख्या वाले छोटे समूहों की भागीदारी को चुना, जहां हर किसी पर व्यक्तिगत तौर पर ध्यान दिया जा सकता है।’’

स्लैप महिलाओं को शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से सशक्त बनाने के लिए प्रयासरत है। डडवाल उन महिलाओं का उदाहरण देती हैं, जिन्होंने सार्वजनिक परिवहन में छेड़खानी और अशिष्ट ताने सहे थे, लेकिन विरोध करने से डरती थीं।

डडवाल कहती हैं, ‘‘कार्यशाला में हम इस तरह की स्थितियों को खुले तौर पर उनके सामने रखते हैं और उन्हें जब अन्य महिलाओं से समर्थन मिलता है तो वे इस आत्मविश्वास के साथ जाती हैं कि अगली बार ऐसा होने पर वह कदम उठाएंगी। इससे भी अच्छी बातें होती हैं जब पुरुष अचानक खड़े हो जाते हैं और कहते हैं कि उन्हें खेद है या शर्म आती है कि यह उनके शहर में हुआ है।’’

डडवाल और स्लैप प्रशिक्षक, प्रत्येक प्रतिभागी में जरूरी उपायों की एक जांच -सूची ( चेकलिस्ट ) वितरित कर अपने प्रशिक्षण को प्रभावी बनाने का एक बहुत ही व्यवहारिक दृष्टिकोण अपनाते हैं:

  • क्या आपके मोबाइल के स्पीड डायल में आपातकालीन संपर्क हैं?
  • क्या आपने अपने मोबाइल में आपातकालीन, जीवन-रक्षक एप को डाउनलोड किया है?
  •  क्या आप काली मिर्च-स्प्रे लेकर चलती हैं?
  •  क्या आपने बुनियादी आत्मरक्षा करना सीखा है?
  •  जब आप अपने आप को मुसीबत में पाते हैं तो क्या आपके पास उसके लिए कोई योजना है?

डडवाल का कहना है, ‘‘हम इस मानसिकता को तोड़ने में सफल हुए हैं कि ये बातें दूसरी महिलाओं के साथ होती हैं, मेरे साथ नहीं।’’

‘‘लेकिन अभी भी बहुत सी महिलाओं के लिए उस अहसास पर अमल करना मुश्किल है।’’
-हॉवर्ड सिनकोटा

लैंगिक हिंसा से निपटने के लिए यूनिवर्सिटी ऑ़फ न्यू हैम्पशायर में चल रहे नवप्रेरित कार्यक्रम के पीछे यही मूल सोच है। इस कार्यक्रम ने पूरे अमेरिका में लोगों का ध्यान खींचा है। यह कार्यक्रम पास खड़े लोगों को इस मामले में शामिल करने का आह्वान करता है और इसके साथ ही सोशल मार्केटिंग अभियान ‘‘नो योर पॉवर’’ भी चलाया जा रहा है।

पास खड़े दर्शक
यूनिवर्सिटी ऑ़फ न्यू हैम्पशायर में वर्ष 2006 में शुरू शोध, प्रशिक्षण एवं समर्थन संगठन प्रवेंशंस इनोवेशंस ने ऐसा प्रोग्राम तैयार किया जिसमें पास खड़े दर्शकों को शामिल किया गया। जेन स्टेपलटन इसकी सह-निदेशक हैं। वर्ष 1987 में परिसर में सामूहिक बलात्कार के मामले के बाद वह लैंगिक मसलों से जुड़ी। इस मामले में अपराधियों को मामूली सजा मिली, पीडि़त ने संस्थान छोड़ दिया और लापता हो गई।

स्टेपलटन याद करती हैं, ‘‘वह समय बहुत अलग था। उस समय डेट रेप या परिचितों द्वारा बलात्कार जैसे शब्द भी नहीं थे। मैने अपने ग्रेजुएट अध्ययन का विषय बदला और लैंगिक बराबरी और हिंसा के मुद्दों पर ध्यान दिया।’’

आज, स्टेपलटन का काम उनके इन्हीं अनुभवों और लैंगिक हिंसा के कारण और रोकथाम पर उनके सालों के गहन शोध पर आधारित है।

स्टेपलटन कहती हैं, ‘‘यह क्षेत्र अब सिर्फ महिलाओं से सुरक्षित रहने के तौरतरीकों के बारे में बात करने और पुरुषों को बलात्कार न करने के लिए कहने तक सीमित नहीं रहा। पास खड़े दर्शकों का हस्तक्षेप करना अलग चीज़ है। महिलाओं तक हम संभावित पीडि़ता और पुरुषों तक संभावित हमलावर के रूप में नहीं पहुंच सकते। बल्कि हम रोकथाम के लिए सामुदायिक दृष्टिकोण को अपनाते हैं जिसमें यौन हिंसा और किसी का पीछा करने के मामलों को खत्म करने में हर किसी की भूमिका है।’’

प्रवेंशंस इनोवेशंस ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा से निपटने के लिए विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम विकसित किए हैं, जिसमें विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान, मनोविज्ञान, सामाजिक कार्य, कानून और महिला अध्ययन के विशेषज्ञ शामिल हैं। इस संदर्भ में यह भी समान रूप से महत्वपूर्ण है कि उन्होंने सख्ती से कार्यक्रम का मूल्यांकन किया है।

स्टेपलटन कहती हैं, ‘‘हमारे कार्य की अनोखी बात यह है कि कार्यक्रम की प्रभावशीलता पर हम शोध करते हैं। सब कुछ साक्ष्य-आधारित शोध पर निर्भर है।’’

इस शोध के आधार पर तैयार कई सबसे अच्छी पद्धतियों को प्रशिक्षण मॉड्यूल की एक शृंखला में बदलकर अमेरिका भर में कॉलेजों और अन्य संगठनों को दिया गया है।

स्टेपलटन कहती हैं, ‘‘पास खड़े दर्शकों से जुड़ा कार्यक्रम एक सार्वजनिक स्वास्थ्य मॉडल का उपयोग करता है- जिसका आधार है कि हिंसा की पहचान और रोकथाम की जा सकती है।’’

90 मिनट या फिर आधे दिन तक चलने वाली कार्यशालाओं में प्रतिभागी, दर्शक हस्तक्षेप की अवधारणा के साथ ही सीखते हैं कि यौन उत्पीड़न के मामले में, घटना के पहले, दौरान या बाद में हस्तक्षेप करने का निर्णय कैसे लें। चर्चा, समूह अभ्यास और भूमिका-निभाने से मिलकर तैयार ये कार्यशालाएं प्रतिभागियों को सशक्त बनाने के लिए परिकल्पित की गई हैं, जिससे उनमें ज़रूरत के समय कदम उठाने का आत्मविश्वास आए और वह खुद को सुरक्षित रखते हुए पीडि़त की सहायता कर सकें। इस तरह, प्रतिभागियों को समुदाय परिवर्तन की एक बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा बनने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, जिसमें लैंगिक हिंसा अस्वीकार्य है।

 

अपनी ताकत पहचानो
सामाजिक मार्केटिंग प्रयास ‘‘अपनी ताकत को जानो’’ ने दृश्यों की एक श्रंखला तैयार की है, जिसमें मुश्किल और तनाव से भरे दृश्य दिखाए गए हैं। इसे उत्पीड़न, पीछा, यौन हिंसा या बलात्कार की स्थितियों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए डिजाइन किया गया है। 20 से भी अधिक संख्या में ये चित्र प्रत्येक संभव प्रारूप वेब तस्वीरें, स्क्रीन पॉप-अप, पोस्टकार्ड, बुक मार्क, पोस्टर और यहां तक कि बस विज्ञापन के रूप में उपलब्ध हैं।

ब्रांडिंग के इस दौर में, विषेश रूप से युवा लोगों के लिए, अभियान का नारा ‘‘अपनी ताकत को पहचानो, कदम बढ़ाओ, अपनी आवाज बुलंद करो, एक दर्शक के तौर पर आप चीज़ें बदल सकते हैं।’’ -इस नारे को पानी की बोतलों, बटन, जिम बैग और टॉर्च जैसी वस्तुओं पर भी जगह दी जा सकती है।

एक ऑनलाइन वीडियो में स्टेपलटन कहती हैं, ‘‘हम अभियान के अनुकूलन और संशोधन के लिए समुदायों के साथ मिलकर काम करते हैं... परियोजना की शुरुआत से यह एक प्रकार का गठबंधन है। हम वास्तव में यह पता लगाते हैं कि लक्ष्य कौन है? क्या बातें उनके लिए महत्वपूर्ण हैं? वे कैसे दिखते हैं? वे कैसी भाषा का प्रयोग करते हैं? समस्याओं के वे कौनसे उदाहरण है जो उनसे ताल्लुक रखते हैं।

स्टेपलटन के नज़रिए से, इसके स्पष्ट साक्ष्य हैं कि अभियान चलाकर लोगों में लैंगिक हिंसा के मुद्दे पर जागरुकता बढ़ाई जा सकती है और वास्तविक या संभावित हिंसा की स्थितियों में हस्तक्षेप करने की आशा बढ़ सकती है।

असली बात यह समझने की है कि ऐसी स्थिति में कोई भी अकेला नहीं है, बल्कि आप एक अधिक बड़े, आपकी चिंता करने वाले समुदाय का हिस्सा हैं, जो महिलाओं के खिलाफ हिंसा को समाप्त करने के लिए दृ़ढ़ संकल्प है और उनके अस्तित्व को अनुमति देने का मनोभाव रखता है।

 

हॉवर्ड सिनकोटा स्वतंत्र लेखक हैं। वह वर्जीनिया में रहते हैं।

टिप्पणियां देखे
Hari Kishan ojha का छायाचित्र

हॉवर्ड सिनकोटा जी, आपका प्रयास बहुत ही काबिलेतारीफ है. आपके विचार सराहनीय है. आज के युग में नारी के प्रति हिंसा चिता का विषय है. हरेक देश में बड़े बड़े कानून बनाये जाते है नारी के प्रति हो रहे अत्याचारों को रोकने के लिए, फिर भी दिल दहलादेने वाली घटनाये होती रहती है. जब तक स्वय नारी खामोशी नहीं तोड़ेगी तब तक बदलाव की उम्मीद नहीं की जा सकती. मैं बहिन बेटियो को यकीन से कह सकता हूँ कि अगर किसी ने आप को गलत नजर से देखा और ऐसी वैसी हरकत की तो तुरंत एक थप्पड़ जड़ दो, वहा पर जितने ही लोग खड़े रहेंगे उस मनचले को ऐसी धुलाई करेंगे की चलने लायक नहीं रहेगा, आप अकेले नहीं है आप के साथ पूरी दुनिया है बस देर है आप की खामोशी तोड़ने की, कोई भी आप के साथ ज्यादती करे एक आवाज उठा दो आप का साथ देने वालो की लाइन लग जाएगी, कुछ भी गलत सहन मत करो आप के पास हो रही छोटी छोटी घटनाओ पर नजर रखो अगर आप को लगे यहाँ गलत हो रहा है तुरत आवाज उठा दो, खुद को कभी अकेला मत समझो.
samita gurg का छायाचित्र

harikishan ji aap ne sahi bat kahi hai dhanyawad
मोनिका ओझा का छायाचित्र

हॉवर्ड सिनकोटा जी, आप का जज्बा मिल का पत्थर साबित हो सकता है जब हौसले बुलंद हो तो राहे आसान हो जाती है. इसलिए महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए सामुदायिक प्रयास महत्वपूर्ण है. इस में हर वर्ग को आगे आना होगा, तभी इस हिंसा से छुटकारा पाया जा सकता है. गैंगरेप, छेड़छाड़, पीछा करना, फब्तियां कसना, बलात्कार की बढ़ती घटनाये चिंता का विषय है. ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए युवा वर्ग को सबसे जयादा अपनी भागीदारी निभानी होगी. आप के आस पास हो रही ऐसी घटनाओं की जानकारी तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम में दे और जैसा की हॉवर्ड सिनकोटा जी ने बताया बहुत सारे संग़ठन इस छेत्र में काम करते है उन को अवगत कराये, हाल ही में हुई उत्तरप्रदेश में दो बहनो की घटना ने देश को हिला के रख दिया था देश में गैंगरेप, छेड़छाड़, पीछा करना, फब्तियां कसना, बलात्कार के गुनगारो को सजा दिलाने के लिए कितनी जिंदगियो को बलि चढ़ना पड़ेगा देहली में हुई घटना के बाद सख्त कानून लाया गया था लेकिन सख्ती से लागु नहीं हुआ उस समय लगा की इस पर लगाम लग जायेगा लेकिन सिस्टम में कोई चेंज नहीं हुआ वैसी ही घटनाये रोज देखने को मिलती है क्या सब ऐसा ही चलता रहेगा, मुझे लगता है अब समय आ गया है खुद की ख़ामोशी तोड़ने का, एक से शुरू होकर कारवाँ बनाना होगा और आस पास की जनता को जागरूक करना पड़ेगा, खुद की ताकत को पहचानना होगा जिस से हम नारी के साथ हो रहे अत्याचार को खत्म कर सके, पुलिस प्रशासन का इस में अपनी भागीदारी अच्छे से निभानी होगी और नया कानून बनाने पर जोर देना होगा जिस में ऐसी सजा का प्रावधान हो जिसमे ऐसी हरकत करने वालो की रूह कांप जाये, जिस से आदमी ऐसी हरकत करने से पहले हजार बार सोचेगा, में समझती हु जब तक डर पैदा नहीं होगा तब तक ऐसी घटनाओ पर रोक नहीं लगेगी, जब ऐसे मामले मीडिया में आते है तो तुरंत एक्शन होता है लेकिन दिन में ऐसी हजारो वारदाते होती है जिस में F.I.R. तक नहीं लिखी जाती, उस को लिखवाने के लिए थाने की घेरा बंदी करनी पड़ती है भारत का कानून इतना लचीला है जिस का हर कोई फायदा उठता है इसलिए आप को कही पर भी ऐसी हरकत करते कोई नजर आये तो तुरत अपनी ख़ामोशी तोड़े, आप की बुलंद आवाज उस दरिंदे को पस्त कर सकती है तमासबीन मत बने तथा ऐसी घटनाओ पर रोक लगाने के लिए सख्त कानून लाना होगा और फ़ास्ट ट्रक कोर्ट में ऐसे मामलो को चलाया जाये ताकि जो औरत इस दहनीय स्थिति से गुजरी है उसे इस मानसिक प्रताड़ना से बचाया जा सके. साथ में इन दरिन्दो को मोत की सजा दी जाये ताकि ऐसी घिनोनी हरकत करने वालो के मन में खौफ पैदा हो, नहीं तो लोग ऐसे ही सरे आम ऐसी घटनाओ को अंजाम देते रहेंगे, और न्याय नहीं मिलने की स्थिति में पीड़िता भी भय के कारण मोत को गले लगा लेगी
samita gurg का छायाचित्र

monika ji aap ke vichar bahut hi sarahniy hai dhanyawad
samita gurg का छायाचित्र

जब तक हम खुद की खामोसी नहीं तोड़ेंगे तब तक बदलाव शम्भव नहीं है हॉवर्ड सिनकोटा जी आप का प्रयाश कबीले तारीफ है हमें मिल जुल कर इस विपति से लड़ना होगा हर एक को आगे आना होगा तभी नीच परवर्ती के लोगो पर लगाम लग सकती है
Dhiraj Kumar का छायाचित्र

महिलाओ को शक्ति हिंसा की रोकथाम: इस सन्दर्भ मैं महिलाओ के न केवल शारीरिक कौशल की बात हो रही है अपितु उनके नैतिक सामजिक और आर्थिक पहलुओ का भी समावेशन अनिवार्य है | २०१२ में हुए निर्भया काण्ड ने पूरे हिन्दुस्तान को हिला कर रख दिया था और उसके बाद हुए मीडिया कैंपेन ने सभी भारत वासियों को इस संवेदन शील मुद्दे पर एक कर दिया था | परन्तु एक बात मीडिया से छूट गई थी वो ये की उस भयंकर काण्ड के वक्त निर्भया के मित्र ने हिम्मत नहीं खोई थी और अत्यंत विषम परिस्थितियों के बावजूद अपनी मित्र का साथ नहीं छोड़ा था | उसे समय मीडिया ने निर्भया को 'निडर' 'बहादुर' 'वीर आदि अनेक अलंकरण दिए थे परन्तु उसके मित्र (लड़के) के द्वारा किये गए साहसिक कार्य (उन गुंडों का विरोध और निर्भया की मदद) को मीडिया ने कहीं स्थान नहीं दिया था | अगर उस समय उसके मित्र को भी 'मदद का फरिश्ता' 'रखवाला' 'सच्चा दोस्त' आदि उपनामों से अलंकृत किया जाता तो आज उस से प्रेरणा ले कर सैंकड़ो हाथ मदद के लिए उठ खड़े होते | अभी भी देर नहीं हुई है महिला ससक्तिकरण के केवल नारो से काम न लेकर समग्र समाज को इससे जोड़ना होगा | ऑफिस में समितियां बना कर, स्कूल मैं स्काउट न गाइड और एनसीसी के मदद से, मोहल्ले में मोहल्ला सभा बना कर, गावो में पंचायत समिति बना कर, महिलाओं और युवतियों के आत्मरक्षा के ट्रेनिंग के लिए तैयार किया जा सकता है | पुरुषो को सेमीनार और चर्चाओ मैं हिस्सा लेना चाहिए की महिलाओ के सम्मान के रक्षा क्यों और कैसे? इस विषय मैं युवाओं को आगे आना पड़ेगा और स्त्री सम्मान के विषय को मुखरता से उठाना पड़ेगा | कई स्वयंसेवी संगठन इन प्रकल्पों से जुड़कर 'खामोश ना रहे' प्रकल्प को आंदोलन बना सकते है |
अभिनव कुमार का छायाचित्र

हावर्ड सिनकोटा जी , आपके जज्बों मैं सलाम करता हू नारी सर्वत्र पूजयते की प्रसिगता कही खोई गई है दिन प्रति दिन आज महिलाओ पर होने वाले अत्याचार घरेलू से लेकर कार्यसथल बढ़ रहा है इनपर होने वाले अपराध को रोकने के लिए विश्व के सभी समुदाय को एक साथ जनांदोलन के द्वारा महिलाओ के साथ कदम से कदम मिला कर चलने की जरुरत है और इस असमानता की खाई को खत्म करने के लिए समाज मैं एक अवेयरनेस और लोगो के माइंड सेट को बदलने की जरुरत है और लिंगानुपात भूढ़ हत्या जैसे ख़तम करने लिए हमें अपने घर से सुरुआत करनी चाहिए और इनको सामाजिक न बांधकर एक ऐसा माहोल तैयार करने चाहिए जिससे वह खुद को आज़ाद महसूस कर सके और इन सब मैं जिम्मेदार नागरिक की तरह गोवेर्मेंट प्रशासनिक लोगो भगीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए !
अजय  कुमार(IITDelhi) का छायाचित्र

बहुत खूब सिनकोटा जी , आपका यह लेख एक ऐसे मुद्दे पर है जिस मुद्दे पर पूरे विश्व को ध्यान देने की जरूरत है...विशेषतौर पर भारत को तो इसकी सख्त जरूरत है (क्योंकि में एक भारतीय हूँ और मुझे भारत की स्थिति मालूम है ) | बहुत दर्द होता है जब निर्भया जैसी घटनाएँ सुनने को मिलती है , निर्भया की घटना तो राजधानी दिल्ली में थी उस वजह से इस घटना ने इतना तूल पकड़ा , परन्तु देश में कही छोटी छोटी जगहों पर ऐसी घटनाये प्रतिदिन देखने को मिलती है...खैर ये समय दर्द जताने का नहीं वरन कुछ करने का है , आज इस विश्व को उन नौजवान (लड़के और लड़कियाँ) की जरुरत है जो की इस तरह की समस्याओं को गंभीरता से ले भले ही ही वो पढ़ा -लिखा हो या न हो , ऐसो की कतई नहीं जो मजाक में टाले और बोले की ये तो देश में रोज का काम है...कतई नहीं | मेरे विचार में इस प्रकार की घटनाओ को रोकने के लिए लोगों को मानसिक रूप से दृढ़ रहना होगा विशेष कर छोटे कस्बो और गाँवो में लोगों को कानून के बारे में बताना होगा जिससे की उनमे ऐसी घटनाओ से निपटने के लिए आत्मविश्वास आये और ये जनजागृति से संभव है इसके साथ ही सरकार को ऐसे काम करने वाले दरिंदो के खिलाफ सख्त कानून बनाकर उनको प्रयोग में लाएं जिससे बाकि ऐसे काम करने के पहले हज़ार बार सोचे | समितियां बनायीं जाये उनके माध्यम से ज्यादा से ज्यादा लोगो को इनसे जोड़े उनको जिम्मेदारी सौंपे गली मोहल्लो विद्यालयों में नुक्कड़ नाटक दिखाए जाये पोस्टर लगाये , देश के सर्वोच्च तकनिकी संस्थानों को भी उनसे जोड़े जिससे की कॉलेजो में पड़ रहे छात्र तकनिकी माध्यम से इसमें सहयोग कर सके लोग इस तरह के सामाजिक बदलावों के बारे में बहुत से लेख पढ़ते है समाचार पत्रो में पढ़ते है और उन दो पलो में उनमे जोश भर जाता है की मुझे भी अपने समाज के लिए कुछ करना चाहिए लेकिन कुछ ही क्षणों में वो जोश गायब हो जाता है हमें ऐसा वातावरण तैयार करना है जिससे वो जोश वो कुछ करने की उम्मीद हमेशा कायम रहे और लोग इस तरह के नेक कार्यो में हमेशा अपनी भागीदारी देते रहे धन्यवाद !
Giriraj Agarwal का छायाचित्र

..........................खामोश दर्शक न बने रहें................................. ...............................लेखिका: स्वाति शर्मा...................... .............................. दुनिया में हर समय एक बलात्कार हो रहा है दुनिया के हर कोने में कोई न कोई दामिनी दम तोड़ रही है कोई भी मीडिया,इंसान,यहाँ तक की खुद भगवान भी उन दरिन्दों के आगे बेबस है क्यों? क्योंकि हम दर्शक खुद बन बैठे है और ख़ामोशी से अपनी बर्बादी का मंजर देख रहे है और हमारी आँखों के सामने इंसानी भेड़िये हैवानियत का नंगा नाच करते चले जा रहे है| एक तितली का बच्चा भी अंडे से निकलने की जद्दोजहद खुद करता है बेशक यह उसके लिए तकलीफ़देह है और इसमे वह अपने पूरी ताकत लगा देता है लेकिन इसके कारण ही उसके पंखों में उड़ने की ताकत आती है| कुदरत का नियम यही नियम है कि पहल आपको खुद को करनी होगी| उत्तरप्रदेश में एक लड़की 9 साल तक अपने पिता रामशरण और अपने भाई राहुल की हवस का शिकार होती रही और जब उसने ये बात अपने माँ को बताई तो माँ ने समाज का डर दिखा कर उसे चुप करा दिया| आखिरकार उसे सारी बात पुलिस को बतानी पड़ी| क्या हर लड़की इस तरह अपनी आवाज नहीं उठा सकती? क्योंकि बहरों को सुनाने के लिए धमाकों की जरूरत पड़ती है| हमारा समाज हमें हर बात पर बस यही सिखाता है कि वह मर्द है तो इस समाज से एक सवाल करिए कि क्या हर बलिदान बस औरत के लिए बना है कभी सम्मान के नाम पर तो कभी पवित्रता के नाम पर| समाज से अपेक्षा करना व्यर्थ है यदि आप अपने आप के लिए आवाज नही उठा सकती| यदि अपनी आत्मा की चीखों से आपका साहस नही जाग रहा तो किसी और का क्यों जागेगा| यदि आप खुद ही इस तमाशे को देख रहीं है तो दूसरा ताली बजाने से क्यों खुद को रोकेगा| आज कल एक वीडियो सबके सामने आया है जिसमें दिखाया गया है कि बचपन से लड़कों को सिखाया जाता है लड़के रोते नहीं है पर अब लड़कों को ये सिखाया जाने चाहिए कि लड़के रुलाते नहीं है क्योंकि ये अगर सिखाया जाता तो आंध्रप्रदेश में गुंटूर जिले की 20 साल की छात्रा त्रिवेणी आज जिन्दा होती जिसे उसके सीनियर्स ने रैगिंग की नाम पर केमिकल पीने पर मजबूर कर दिया था|
Sujan Kavi का छायाचित्र

रोकथाम के लिये ही प्रयास होने चाहियें। यह सही कहा आपने, भारत में अक्सर भीड को दिखाने, पुरस्कार पाने के लिये, लोग बदलाव के काम को जगह देने लगते हैं। सामाजिक जागरूकता को तो सिर्फ करते जायें , एक समय में अत्यधिक प्रयासों को लोग स्वंय तरजीह देंगे।
Praveen Gola का छायाचित्र

अभी हाल ही में दिनांक २५ नवंबर ,२०१४ को अमेरिकन सेंटर में सम्पन्न हुए "स्ट्रीट लेवल अवेयरनेस प्रोग्राम यानि स्लैप" के द्वारा आयोजित कार्यशाला की मैं भी एक प्रतिभागी थी । इस कार्यशाला में भाग लेने का मेरा मकसद सिर्फ इतना था कि एक महिला होने के नाते ना केवल मैं अपनी ताकत को पहचानूँ अपितु समाज में हो रहे महिलाओं के खिलाफ ज़ुर्म के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों को उन खामोश दर्शकों के सामने पेश कर सकूँ जो कि मौन रहकर अपनी उपस्तिथिति तो लगाते हैं परन्तु उस उपस्तिथिति को एक सामुदायिक प्रयास के साथ मिलकर रोक पाने में सफ़ल नहीं हो पाते । मैं एक स्वतन्त्र लेखिका होने के नाते खुद इस कार्यक्रम को पहले भली -भाँति समझना चाहती थी और तभी इसके ऊपर कोई लेख या टिप्पणी लिख कर अपने विचार प्रकट करना चाहती थी । और वहाँ जाकर मैंने ये पाया कि ऐसे कार्यक्रमों की पहल करके हम ना केवल इस देश को सशक्त बना सकते हैं अपितु महिलाओं और पुरुषों के बीच होने वाली लैंगिक हिंसाओं को भी बहुत जल्द काबू में ला सकते हैं । वहाँ पर आई हुई मृगांका डडवाल से जब मेरी आमने-सामने मुलाक़ात हुई तब मैंने पाया कि उनके द्वारा की गई ये नई पहल बहुत ही सराहनीय है क्योंकि अपने इन्ही प्रयासों से वह नई दिल्ली में हुए "निर्भया" काण्ड को दुबारा होने से रोकने के विरूद्ध अपनी आवाज़ को बुलंद रख रही हैं । उन्होंने वहाँ पर ना केवल महिलाओं को अपनी आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दिया बल्कि उन सभी परिस्थितियों से अवगत भी कराया जहाँ पर महिलायों को अक्सर अपनी सूझ-बूझ और साहस का परिचय देना पड़ता है । यहाँ पर हम बात कर रहे हैं "खामोश दर्शकों " की जो अनगिनत तादाद में खड़े रहकर ना केवल महिलाओं का मज़ाक उड़ाते हैं अपितु उनपर ढेरों फब्तियाँ भी कसते हैं । लैंगिक हिंसा सदियों से चली आ रही एक ऐसी परंपरा है जिसे मनुष्य तोड़ना ही नहीं चाहता बल्कि पुरुष उस हिंसा को करते वक़्त अपने अंदर एक गौरव का अनुभव भी करने लगता है । परन्तु उस हिंसा के शिकार बने उस मनुष्य की मानसिकता को अगर हम अपने अंदर अनुभव करके देखें तो हम उनके दर्द को भली-भाँति समझ सकते हैं । कहते हैं कि एक खामोशी ही ऐसे अपराधियों की गतिविधियों को और ज्यादा बढ़ावा देती है तो फिर क्यूँ नहीं हम सब एकजुट होकर ऐसे जुर्म के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाते , और क्यूँ एक मूक दर्शक बन अपने वजूद को कहीं अंदर ही अंदर मरने देते हैं ? आज सामुदायिक प्रयासों से कई जगाहों पर ऐसी घटनायों को रोकने में सुधार आया है और साथ ही उन घटनायों को अंजाम देने वालों के मन में एक खौफ भी पैदा हुआ है । हमेशा याद रखें कि खामोशी हमारी कायरता को दर्शाती है और अपनी आवाज़ को बुलंद करके उसे औरों तक पहुँचाना हमें और ज्यादा सशक्त बनाती है ।